क्षत्रिय कोली राजपूत: महाभारत के युग के उपरान्त

  • महाभारत  युग के बाद क्रांतिकारी परिवर्तन।
महाभारत के युग के उपरान्त इस सम्पूर्ण क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ। कोशल राज्य के अधीन अनेक छोटे-छोटे गणतंत्रात्मक राज्य असितत्व में आये, जिसमें कपिलवस्तु के क्षत्रिय शाक्यों और रामग्राम के क्षत्रिय कोलियों का राज्य वर्तमान महराजगंज जनपद की सीमाओं में भी विस्तृत था। क्षत्रिय शाक्य एवं क्षत्रिय कोलिय गणराज्य की राजधानी रामग्राम की पहचान की समस्या अब भी उलझी हुई है। डा. राम बली पांडेय ने रामग्राम को गोरखपुर के समीप स्थित रामगढ़ ताल से समीकृत करने का प्रयास किया है किन्तु आधुनिक शोधों ने इस समस्या को नि:सार बना दिया है। क्षत्रिय कोलिय का सम्बंध देवदह नामक नगर से भी था। बौद्धगंथों में भगवान गौतम बुद्ध की माता महामाया, मौसी महाप्रजापति गौतमी एवं पत्नी भद्रा कात्यायनी (यशोधरा) को देवदह नगर से ही सम्बनिधत बताया गया है। 
  महराजगंज जनपद के अड्डा बाजार के समीप स्थित बनसिहा- कला में 88.8 एकड़ भूमि पर एक नगर, किले एवं स्तूप के अवशेष उपलब्ध हुए हैं। 1992 में डा. लाल चन्द्र सिंह के नेतृत्व में किये गये प्रारंभिक उत्खनन से यहां टीले के निचते स्तर से उत्तरी कृष्णवणीय मृदमाण्ड (एन.बी.पी.) पात्र- परम्परा के अवशेष उपलब्ध हुए हैं गोरखपुर विश्वविधालय के प्राचीन इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष डा. सी.डी.चटर्जी ने देवदह की पहचान बरसिहा कला से ही करने का आग्रह किया। महराजगंज में दिनांक 27-2-97 को आयोजित देवदह-रामग्राम महोत्सव गोष्ठी में डा. शिवाजी ने भी इसी स्थल को देवदह से समीकृत करने का प्रस्ताव रखा था। सिंहली गाथाओं में देवदह को लुम्बिनी समीप स्थित बताया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि देवदह नगर कपिलवस्तु एवं लुम्बिनी को मिलाने वाली रेखा में ही पूर्व की ओर स्थित रहा होगा। श्री विजय कुमार ने देवदह के जनपद के धैरहरा एंव त्रिलोकपुर में स्थित होने की संभावना व्यक्त की है। पालि-ग्रन्थों में देवदह के महाराज अंजन का विवरण प्राप्त होता है। जिनके दौहित्र गौतम बुद्ध थे। प्रो. दयानाथ त्रिपाठी की मान्यता है कि महाराज अंजन की गणभूमि ही कलांतर में विकृत होकर महाराजगंज एवं अंन्तत: महाराजगंज के रूप परिणित हुई। फारसी भाषा का गंज शब्द बाजार, अनाज की मंडी, भंडार अथवा खजाने के अर्थ में प्रयुक्त है जो महाराजा अंजन के खजाने अथवा प्रमुख विकय केन्द्र होने के कारण मुसिलम काल में गंज शब्द से जुड़ गया। जिसका अभिलेखीय प्रमाण भी उपलब्ध है। ज्ञातव्य हो कि शोडास के मथुरा पाषाण लेख में गंजवर नामक पदाधिकारी का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है। छठी शताब्दी ई0 में पूर्व में अन्य गणतंत्रों की भांति कोलिय गणतंत्र भी एक सुनिश्चित भोगौलिक इकाई के रूप में स्थित था। यहां का शासन कतिपय कुलीन नागरिकों के निर्णयानुसार संचालित होता था। तत्कालीन गणतंत्रों की शासन प्रणाली एवं प्रक्रिया से स्पष्टत: प्रमाणित होता है कि जनतंत्र बुद्ध अत्यन्त लोकप्रिय थे। इसका प्रमाण बौद्ध ग्रंथों में वर्णित शक्यो एवं कोलियों के बीच रोहिणी नदी के जल के बटवारें को लेकर उत्पन्न विवाद को सुलझाने में महात्मा बुद्ध की सक्रिय एवं प्रभावी भूमिका में दर्शनीय है। इस घटना से यह भी प्रमाणित हो जाता है कि इस क्षेत्र के निवासी अति प्राचीन काल से ही कृषि कर्म के प्रति जागरूक थे। कुशीनगर के बुद्ध के परिनिर्वाण के उपरांत उनके पवित्र अवशेष का एक भाग प्राप्त करने के उद्देश्य से जनपद के कोलियों का दूत भी कुशीनगर पहुंचा था। कोलियों ने भगवान बुद्ध क पवित्र अवशेषों के ऊपर रामग्राम में एक स्तूप निर्मित किया था, जिसका उल्लेख फाहियान एवं हवेनसांग ने अपने विवरणों में किया है। निरायवली-सूत्र नामक ग्रंथ से ज्ञात होता है कि जब कोशल नरेश अजातशत्रु ने वैशाली के लिचिछवियों पर आक्रमण किया था, उस समय लिचिछवि गणप्रमुख चेटक ने अजातशत्रु के विरूद्व युद्ध करने के लिए अट्ठारह गणराज्यों का आहवान किया था। इस संघ में कोलिय गणराज्य भी सम्मिलित था। छठी षताब्दी ई. पूर्व के उपरांत राजनीतिक एकीकरण की जो प्रक्रिया प्रारम्भ हुई उसकी चरम परिणति अशोक द्वारा कलिंग युद्ध के अनंतर शास्त्र का सदा के लिए तिलांजलि द्वारा हुआ। महराजगंज जनपद का यह संपूर्ण क्षेत्र नंदों एवं मौर्य सम्राटों के अधीन रहा। फाहियान एंव हवेनसांग ने सम्राट अशोक के रामग्राम आने एवं उसके द्वारा रामग्राम स्तूप की धातुओं को निकालने के प्रयास का उल्लेख किया है। अश्वघोष के द्वारा लिखित बुद्ध चरित (28/66) में वर्णित है कि समीप के कुण्ड में निवास करने वाले एवं स्तूप की रक्षा करने की नाग की प्रार्थना से द्रवित होकर उसने अपने संकल्प की परित्याग कर दिया था।
Source : महाराज गंज का इतिहास
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Revolutionary changes after the Mahabharata era.
 After the era of Mahabharata, there was a revolutionary change in this whole area.  Many small republican states came into existence under the Kosala kingdom, in which the kingdom of the Kshatriya Shakyas of Kapilvastu and the Kshatriya Kolis of Ramgram extended even within the boundaries of the present Maharajganj district.  The problem of identity of Ramgram, the capital of Kshatriya Shakya and Kshatriya Koliya republic, is still entangled.  Dr. Ram Bali Pandey has tried to equate Ramgram with Ramgarh Tal situated near Gorakhpur, but modern research has made this problem pointless.  The Kshatriya Koliyas were also related to a city called Devdah.  In the Buddhist texts, Lord Gautam Buddha’s mother Mahamaya, aunt Mahaprajapati Gautami and wife Bhadra Katyayani (Yashodhara) are said to be related to Devdah city only.
 The remains of a town, fort and stupa have been found on 88.8 acres of land in Bansiha-Kala, located near Adda Bazar of Maharajganj district.  From the preliminary excavations carried out under the leadership of Dr. Lal Chandra Singh in 1992, the remains of the North Krishnavaniya Prudmand (NBP) pot-tradition have been available from the lower level of the mound, former chairman of the Department of Ancient History of Gorakhpur University, Dr.  CD Chatterjee urged to identify Devdah only with Barsiha art.  In the Devdah-Ramgram Mahotsav seminar held on 27-2-97 in Maharajganj, Dr. Shivaji had also proposed to equate this site with Devdah.  In Sinhalese legends, Devdah is said to be located near Lumbini.  The city of Devdah appears to have been situated on the east side of the line joining Kapilvastu and Lumbini.  Shri Vijay Kumar has expressed the possibility of being located in Dhairhara and Trilokpur of Devdah district.  The description of Maharaj Anjan of Devdah is found in the Pali texts.  Whose grandson was Gautam Buddha.  Pro.  It is the belief of Dayanath Tripathi that Maharaj Anjan’s Ganbhoomi was distorted in the course of time and transformed into Maharajganj and finally Maharajganj.  The word Ganj in Persian language is used in the sense of market, grain market, store or treasury, which got associated with the word Ganj in the Muslim period due to being the treasure or the main selling center of Maharaja Anjan.  Archival evidence of which is also available.  It should be noted that in the Mathura stone inscription of Shodas, an official named Ganjwar has been clearly mentioned.  In the sixth century AD, like other republics in the East, the Koliya Republic was also situated as a definite geographical unit.  The government here was governed by the decision of certain elite citizens.  The governance system and process of the republics of that time clearly proves that the Buddha was very popular.  The evidence of this is visible in the active and effective role of Mahatma Buddha in resolving the dispute arising between the Shakyo and the Kolis mentioned in the Buddhist texts over the distribution of the waters of the river Rohini.  This incident also proves that the residents of this area were aware of agricultural work since time immemorial.  After the parinirvana of the Buddha of Kushinagar, the messenger of the Kolis of the district had also reached Kushinagar for the purpose of getting a part of his holy relic.  The Kolis had built a stupa at Ramgram over the sacred relics of Lord Buddha, which is mentioned by Fahien and Hiuensang in their descriptions.  It is known from a text called Nirayavali-sutra that when the Kosala king Ajatashatru attacked the Lichichavis of Vaishali, at that time the Lichichavi Ganapramukh Chetaka called for eighteen republics to fight against Ajatashatru.  The Koli Republic was also included in this union.  The process of political integration that began after the sixth century BC was the culmination of Ashoka’s dissolution of the eternal scripture of the Kalinga war for ever.  This entire area of ​​Maharajganj district remained under the Nandas and Maurya emperors.  Fahien and Hiuensang have mentioned about the coming of Emperor Ashoka to Ramgram and his attempt to extract the metals of Ramgram Stupa.  It is mentioned in the Buddha Charita (28/66) written by Ashvaghosha that he had abandoned his resolve after being moved by the serpent’s prayer to protect the stupa who resided in the nearby pool.
 Source : History of Maharaj Ganj
 
Author: admin

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