नागवंशी कांशी नरेश राजा राम तथा शाक्य कुमारी अमृता का कोलवन में संयोग व कोलिय क्षत्रियों की उत्पत्ति

ऐतिहासिक शोधों से प्रमाणित ।

शाक्यों की उत्पत्ति सूर्यवंशी महाराजा इक्ष्वाकु जिसे पाली भाषा ग्रन्थों में ओकाक कहा गया है तथा उनकी पट्टमहिषी रानी से हुई और शाकोट वन के कारण ये शाक्य क्षत्रिय कहलाये ।

साकेत (कौशल) के प्रतापी राजा इक्ष्वाकु की प्रथम रानी के चार पुत्र क्रमशः ओलखामुख, करकण्ड, हसितशोर्य व ओपुर तथा पाँच पुत्रियाँ अमृता (प्रिया), सुप्रिया, आनन्दा, विजीति व विजितसेना कुल 09 सन्ताने थी । राजा के लिये ये सभी सन्तानें प्रिय थी । नियमानुसार भी राजा इक्ष्वाकु के बड़ी रानी का बड़ा पुत्र ही राज्य सिहांसन का अधिकारी था ।

इक्ष्वाकु की एक और रानी जयन्ति के गर्भ से एक पुत्र जयन्त (जनु) का जन्म हुआ । इस रानी के मोहपाश में आकर राजा ने इन पुत्रों को निर्वासन की आज्ञा दे दी । इन पुत्रों के निर्वासन का मूल कारण छोटी रानी जयन्ती का स्वार्थमय विचार था, ताकि उसके पुत्र जयन्त (जनु) को राजगद्दी प्राप्त हो सके । इसलिये राजा इक्ष्वाकु को पूर्व सन्तानों को निर्वासन की आज्ञा देने के लिये विवश होना पड़ा । कई ग्रन्थों में इक्ष्वाकु वंशीय सन्तानें राजा सुजात की भी बताई गई हैं ।

इस प्रकार निर्वासित सन्ताने अपनी बहनों सहित पिता की आज्ञा का पालन करते हुए हिमालय की और अग्रसर हुई । रोहिणी नदी के तट पर एक विस्तृत शाक वन (साल का वन) में ये लोग रुक गए, क्योंकि इसी वन में महाऋषि भगवान कपिल का भी आश्रम था । ऋषि के आश्रम में पहुँचकर सभी राजकुमारों ने महाऋषि के दर्शन से बड़ी शान्ति मिली ।महाऋषि ने उनकी स्थिति का पूरा वृतान्त जानने के उपरान्त अपने ही आश्रम के पास सुन्दर स्थान का चयन कर निवास की आज्ञा दे दी । शाक वन (साल) के वृक्षों को काटकर निर्वासित राजपुत्रों ने एक सुन्दर बस्ती का निर्माण किया, जिसका नाम उन्होंने महाऋषि कपिल के नाम से कपिलवस्तु रख दिया । धीरे-धीरे भीषण वनों को काटकर इन राजकुमारों ने एक राज्य की स्थापना की, जिसका नाम शाक्य गणराज्य रखा गया और इक्ष्वाकु वंश की परम्परानुसार सबसे बड़े राजकुमार ओल्कामुख इस राज्य की राजगद्दी पर बैठे । अपनी इस शक्यता के कारण ये लोग शाक्य कहलाये और इनका वंश शाक्य वंश से प्रख्यात हुआ ।

  •  नागवंशी कांशी नरेश राजा राम तथा शाक्य कुमारी अमृता का कोलवन में संयोग व कोलिय क्षत्रियों की उत्पत्ति।
कांशी सोमदत्त के ब्रह्मदत्त नामक पुत्र हुए , इसी परम्परा में राम नाम के प्रतापी नर कांशी राजगद्दी पर आसीन हुए । सारी प्रजा इनके शासनकाल में वैभवशाली कांशी नगरी प्रसन्ता-पूर्वक जी रही थी । राजा अपनी प्रजा के लिये प्रजा के पालन तथा सुख-सुविधायों के लिये तत्पर थे । उनकी पचास सभासदों से उक्त कांशी नगरी हर दिशा में विश्व में प्रशंसनीय थी । प्रजा अपने प्रिय राजा के प्रति कृतज्ञ व स्नेहमय व्यवहार रखती थी । विधि का विधान राजा राम के लिये समय से पूर्व ही वन गमन की व्यवस्था लेकर उपस्थित हुआ कि प्रजापति राजा राम अचानक ही चरम रोग से ग्रसित हो गये । इस रोग से पीड़ित राजा राम ने भगवान के इस कार्यक्रम को स्वीकार करते हुए कांशी का राज्य अपने पुत्रों को सौंप स्वयं वन के लिये प्रस्थान कर दिया । सारी प्रजा इस अनहोनी घटना से हतप्रभ और दुःखी हुई। राजा राम तपस्या के लिये परमब्रह्म में साक्षात्कार से निमित्त हिमालय की पावन भूमि की ओर दण्ड-कमण्डल लेकर चल पड़े । अपनी विकट यात्रा पथ पर चलते हुए राजा राम ने हिमालय के वनखण्ड में विश्राम करना चाहा और अपनी तपस्या का सही स्थान जानकर वहीं निवास का निश्चय कर एक कोल वृक्ष के क्षेत्र में आसन जमा दिया । दिन-रात कठिन साधना और भोजन का एकमात्र साधन कोल वृक्ष के फल राजा के प्राण रक्षा हेतु थे । कालान्तर में राजा राम को अपने स्वास्थ्य में सुधार हुआ तथा राजा राम चर्मरोग से मुक्त हो गये । अब राजा राम दुगुने साहस से कठिन तप करने लग गये। कठिन तपस्या करने एवं कोल वृक्षों के वन्य फलों को भोजन के रूप में ग्रहण करना उनकी दिनचर्या थी । अब वह कांशी नरेश राजा राम नहीं अपितु कोल ऋषि के नाम से प्रख्यात हुए ।
  • कोलवन की प्रभावशाली जलवायु से रोगमुक्त।
जैसे कि पहले वर्णन किया जा चुका है कि इक्षवाकु वंशीय चारों राजकुमार निर्वासित होकर कपिलवस्तु में अपनी बहनों सहित निवास कर रहे थे । उनकी ज्येष्ठ बहिन अमृता-प्रिया नामों से कई स्थानों पर पुकारा गया है जो उनके जयेष्ठ होने के नाते संरक्षिका मातृतुल्य थी अचानक चर्मरोग से ग्रसित हो गई । बहिन को इस असाध्य रोग से ग्रसित देख सभी शाक्य राजकुमार चिंतित एवं दुःखी हुये । भरपूर उपचार के पश्चात भी अब अमृता रोग मुक्त नहीं हो पाई थी । विवश होकर शाक्य राजकुमारों ने खाने-पीने की सामग्री सहित हिमालय के पावन क्षेत्र में एक सुरिक्षत गुफा में उसके भाग्य पर छोड़ दिया तथा गुफा को उसके छोटे भाईयों द्वारा बड़ी-बड़ी शिलाओं से जंगली जानवरों के भय से बंद कर दिया था । शिला इतने बड़े थे कि वह उनको हिला तक न सकी । भाग्यवश कोलवन की प्रभावशाली जलवायु में धीरे-धीरे उसे स्वास्थ्य लाभ होने लगा तथा कुछ समय उपरान्त वह रोगमुक्त होकर पूर्ण स्वस्थ हो गई थी ।
  • राजा राम (कोल ऋषि) और  शाक्य राजकुमारी का पारस्परिक विवाह ।
एक दिन राजा राम (कोल ऋषि) को उस निर्जन वन में स्त्री कण्ठ ध्वनि सुनाई दी । कोल ऋषि ध्वनि को लक्ष्य दिशा निर्धारण कर आगे बढ़ने लगे । कुछ दूर आगे जाने पर देखते हैं कि एक व्याघ्र (भराग) एक गुफा में प्रवेश करने की चेष्टा कर रहा था और उसी गुफा से स्त्री कण्ठ ध्वनि आ रही थी । राजा राम के भय से व्याघ्र तो भाग गया और गुफा द्वार पर खड़े होकर उसी ध्वनि को सुनने लगे । उन्हें निश्चय हो गया कि यह ध्वनि उसी गुफा से आ रही है । बड़े परिश्रम से उन्होंने गुफा द्वार को साफ किया तो उन्हें एक स्त्री दिखाई दी । स्त्री बहुत रूपवान थी । राजा ने स्त्री का हाथ पकड़कर बाहर निकाला और राजा उसकी सुन्दरता देखकर चकित रह गया । राजा ने युवती का परिचय पूछा तो उसने बताया कि मैं शाक्य राजकुमारी हूँ तथा मुझे चर्मरोग हो गया था तो उसके भाइयों ने उसे इस गुफा में रख दिया था।  राजा ने युवती को अपने भाइयों के पास जाने की सलाह दी थी, किन्तु अमृता ने यह कहकर कि इक्षवाकु कुमारी एक ही बार किसी पुरुष का पाणिग्रहण कर सकती है । अब वह वहाँ नहीं जाएगी । अमृता ने राजा राम  का परिचय जानना चाहा तो राजा राम ने सारी कथा अमृता से कह डाली ।
           विधि का विधान मानकर दोनों कोलवृक्ष को साक्षी मानकर पारस्परिक विवाह सूत्र में बन्ध गये तथा इसी वन मे यह दंपत्ति निवास करने लगे ।
 
राजा राम (कोलऋषि) अपनी इस शाक्य पत्नी अमृता से जो सन्ताने हुई वे कोलिय कहलाये । अमृता व राम की संतानें धीरे-धीरे अपने माता-पिता के पालन में उसी कोलवन में यौवन की और अग्रसर होने लगी । विश्वकोश के विज्ञान लेखक के अनुसार राजऋषि कोल की संतति 24 पुत्रों की वंश परम्परा में 218 उपवंश उससे आगे 551 शाखाओं में सम्पूर्ण देश मे विस्तृत हुई ।
 

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