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Monday, June 1, 2020

क्षत्रिय नागवंशी कोलिय कुल(Kshatriya Nagvanshi Koli Kul)

June 01, 2020 0
क्षत्रिय नागवंशी कोलिय कुल(Kshatriya Nagvanshi Koli Kul)

क्षत्रिय नागवंशी कोलिय कुल(Kshatriya Nagvanshi Koli Kul):

क्षत्रिय नागवंशी कोलिय कुल एक विशुद्ध क्षत्रिय कुल है।अगर आप भगवान गौतम बुद्ध को जानते हैं तो आप कोलिय को भी भली भांति पहचानते हैं। गौतम बुद्ध की माताजी नागवंशी क्षत्रिय कोलिय राजकुमारी थी। सिंह शब्द का उच्चारण सर्वप्रथम "शाक्य सिंह" सिद्धार्थ गौतम के लिए किया गया। सूर्यवंशी क्षत्रियो की शाखा नागवंशी क्षत्रिय है और नागवंशी क्षत्रियो की शाखा कोलिय कुल है।

कोलिय क्षत्रियो को  नागवंशी क्षत्रिय भी कह सकते हैं, ऐसा माना जाता है कि सूर्य की तीसरी पत्नी क्रोधवशा से नागवंश की उत्पत्ति हुई। और इससे आगे  नागवंशी क्षत्रिय राजा राम ओर सूर्यवँशी शाक्य राजकुमारी पिया से काशी में  क्षत्रिय नागवंशी कोलिय कुल आगे बढ़ा।  काशी महादेव की भूमि है और काशी पर नागवंशी क्षत्रियों का ही राज्य रहा है। जैन धर्म के तेइसवें तीर्थकर भगवान पार्श्वनाथ ने काशी के महाप्रतापी राजा अश्वसेन के पुत्ररूप मैं जन्म लिया था जो एक नागवंशी कोलिय क्षत्रिय थे।

 
 

 

शक्तिशाली क्षत्रिय कोलिय राजा राजा चोल प्रथम:चोल साम्राज्य

June 01, 2020 0
शक्तिशाली क्षत्रिय कोलिय राजा राजा चोल प्रथम:चोल साम्राज्य
 
वंश                              : चोल वंश
शासन काल                 : 985 ईसवी से 1014 ईसवी तक
पदवी                          : राजकेसरी
राजधानी                     : तंजौर
पूर्वाधिकारी                 : उत्तम चोल
उत्तराधिकारी              : राजेन्द्र चोल प्रथम
पिता                          : सुन्दर चोल
रानियाँ                       : लोकमहादेवी, चोलमहादेवी, , पँचवान्महादेवी, अभिमानावल्ली, पृथ्वीमहादेवी
बच्चे                          : राजेंद्र चोल प्रथम, कुंदवाई मदेवादिगल
बचपन का नाम          : अरुलमोजहीवर्मन
 
 
चोल शब्द  से कोलिय शब्द   का संबंध:
'चोल' शब्द की व्युत्पत्ति विभिन्न प्रकार से की जाती रही है। चोल शब्द को संस्कृत "काल" एवं "कोल" से संबंध है। चोल शब्द को संस्कृत "चोर" तथा तमिल "चोलम्" से भी संबंध है।
 
चोल साम्राज्य के बारे मे जिसने जीता समुद्व फतह की लंका                                                                     
 
दक्षिण भारत में शक्तिशाली तमिल चोल साम्राज्य का इतिहास 9वीं शताब्दी से लेकर 13वीं शताब्दी तक मिलता है। चोल साम्राज्य के 20 राजाओं ने दक्षिण एशिया के एक बड़े हिस्से पर लगभग 400 साल तक शासन किया। मेगस्थनीज की इंडिका और अशोक के अभिलेख में भी चोलों का उल्लेख किया गया है।
 
कहते हैं कि चोल शासकों ने अपनी विजय यात्रा में आज के केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, बंगाल और दक्षिण एशिया में पूरा हिंद महासागर व श्रीलंका और दक्षिण पूर्व एशिया में अंडमान-निकोबार, मलेशिया, थाईलैंड एवं इंडोनेशिया तक को फतह किया था।
 
विजयालय चोल ने रखी थी नींव:
कांची के पल्लवों के सामंत विजयालय चोल ने सन 850 ईस्वी में तंजौर पर कब्जा कर चोल साम्राज्य की नींव रखी। नौवीं शताब्दी के अंत तक चोलों ने पूरे पल्लव साम्राज्य को हराकर पूरी तरह से तमिल राज्य पर अपना कब्जा कर लिया.इसी कड़ी में आगे 985 ईस्वी में शक्तिशाली चोल राजा अरुमोलीवर्मन ने अपने आपको राजराजा प्रथम घोषित किया, जो आगे चलकर चोल शक्ति को चरमोत्कर्ष पर ले गया।
 
चोल वंश के पहले प्रतापी राजा राजराजा ने अपने 30 के शासन में चोल साम्राज्य को काफी विस्तृत कर लिया था. राजाराज ने पांड्या और केरल राज्यों के राजाओं को हराकर अपनी विजय की शुरुआत की।  उन्होंने पश्चिमी तट, दक्षिणी तट और अपनी शक्तिशाली नौसेना की सहायता से श्रीलंका के उत्तरी राज्य सिंहल द्वीप पर कब्जा किया ।
 
‘राजराज प्रथम’ की रक्त नीति:
शायद इसलिए ही कहा जाता है कि राजराजा के शासन काल में चोल दक्षिण भारत का सबसे शक्तिशाली राज्य बना। वह पांड्य, केरल व श्रीलंका के राजाओं का मजबूत संघ नष्ट कर अपने अंत समय में मालदीव और मैसूर के कई हिस्सों पर कब्जा करने में सफल रहा। राजराजा प्रथम ने लौह और रक्त की नीति का पालन करते हुए श्रीलंका के शासक महिंद पंचम को पराजित कर मामुण्‍डी चोल मण्डलम नामक नए प्रांत को स्थापित किया।  साथ ही उसकी राजधानी जनजाथमंगलम बनाई। इसके अलावा 1012 ईस्वी में राजराजा ने कंबोडिया के सबसे बड़े हिंदू मंदिर अंकोरवाट को बनवाने वाले राजा सूर्य वर्मन के साथ कूटनीतिक संबंध बनाए। राजराजा ने 1010 ईस्वी में थंजावुर में भगवान शिव को समर्पित बृहदेश्वर या राजराजेश्वर मंदिर का निर्माण कराया। यह दक्षिण भारतीय शैली में वास्तुकला का उल्लेखनीय नमूना माना जाता है।
 
‘राजेंद्र प्रथम’ ने किया विस्तार:
चोलों के विस्तार की बात आती है, तो राजेंद्र प्रथम का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। 1012 ईस्वी के आसपास चोल साम्राज्य के उत्तराधिकारी बनने के बाद उन्होंने अपने पिता राजराजा की विस्तारवादी विजय नीतियों को आगे बढ़ाया। पिता से भी आगे बढ़कर राजेंद्र प्रथम ने दक्षिण भारत में अपने वंश की महानता का डंका बजाया।
राजेंद्र प्रथम ने चोल साम्राज्य की सीमा का विस्तार अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, श्रीलंका, मालदीव, मलेशिया, दक्षिणी थाईलैंड और इंडोनेशिया तक कर लिया।
 
प्राचीन समय में व्यापार मुख्य रूप से समुद्री मार्ग से होता था।  मालों से लदे जहाज हिंद महासागर होकर चीन-जापान व दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों तक माल ले जाया करते थे। अपने व्यापार को बढ़ाने और समुद्री सुरक्षा के लिए राजेंद्र प्रथम समुद्र जीतने निकल पड़ा। इसने अपने नौसेना बेड़े को मजबूत किया और लड़ाकू जहाजों व छोटे गश्ती जहाजों की टोली बनाकर राज्यों की समुद्री सीमाओं पर तैनात कर दिया।  देखते ही देखते समूचे हिंद महासागर और मालदीव, बंगाल की खाड़ी और मलक्का तक पूरे समुद्र को चोल राजाओं ने जीत लिया और उस पर अपना एकछत्र राज कायम किया।
 
समुद्री व्यापार मार्ग पर कब्जा:
उसने अपने व्यापार को इस रास्ते चीन-जापान और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों तक पहुंचाने के साथ-साथ वहां से गुजरने वाले अन्य जहाजों को भी सुरक्षित किया और उन्हें सुरक्षा प्रदान की। हालांकि, दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से चाेलाें के अच्छे संबंध थे, फिर भी वहां के सैनिक हर राेज चोलों की नावों को लूट लेते थे। इन्हें सबक सिखाने के लिए राजेंद्र प्रथम ने सन् 1025 ईस्वी में गंगा सागर पार कर जावा और सुमात्रा द्वीप पर अधिकार किया. वहीं चोल नौसेना ने इसके बाद मलेशिया पर आक्रमण कर उसके प्रमुख बंदरगाह कंडारम पर अपना कब्जा कर लिया। इन सब के बाद दक्षिण का समुद्री व्यापार मार्ग पूरी तरह से चोलों के कब्जे में था।
 
    उनके बाद उनका बेटा राजाधिराज प्रथम 1044 ईस्वी में गद्दी पर बैठा।  उसने सीलोन में शत्रुतापूर्ण ताकतों को उखाड़ फेंका और इस क्षेत्र को अपने अधीन कर लिया। कोप्पम में चालुक्य राजा सोमेश्वर द्वितीय के साथ लड़ाई में इनकी मौत हो गई। इस कारण आगे उनके भाई राजेंद्र द्वितीय ने राजगद्दी संभाली।
 
    चोल-वंश के कालखंड में, चोल-नौसेना को सबसे शक्तिशाली नौ-सेनाओं में से एक माना जाता था। कहते हैं कि नौसेना के दम पर ही अपने चोल अपने सम्राज्य का विस्तार कर पाए।  सही मायने में उनकी नौसेना ही उनकी असल ताकत थी।  खोज-यात्राओं के कई उदाहरण संगम-साहित्य में आज भी उपलब्ध हैं।  दरअसल विश्व में ज्यादातर नौ-सेनाओं ने बहुत देर के बाद युद्ध-पोतों पर महिलाओं को जाने के लिए मंजूरी दी थी।
     खास बात तो यह है कि चोल-नौसेना में बहुत बड़ी संख्या में महिलाओं काम करती थी।  वहां उनकी भूमिका अहम होती थी। जरूरत पड़ने पर वह युद्ध में भी शामिल होती।  इसके साथ-साथ चोल-शासकों के पास युद्ध पोतों के निर्माण के बारे में एक समृद्ध ज्ञान था, जिसका प्रयोग करते हुए वह दुश्मन को घुटने टेकने पर मजबूर करते रहे। चोल-नौसेना के महत्व को इसी से समझा जा सकता है कि सदियों बाद भी उसकी प्रासंगिकता बनी हुई है. यहां तक कि नवंबर 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यक्रम मन की बात की बात में इसका गुणगान किया था.
 
चोल साम्राज्य का पतन:
मध्ययुग के कई तमिल कवियों ने भी अपनी कविताओं में चोल राजाओं की विजयों का वर्णन किया है। चोलों के समय महमूद गजनवी जैसे कई आक्रांताओं ने भारत पर लूट के मकसद से आक्रमण कर दिया था।  ऐसे में लुटते उत्तर भारत को देखते हुए राजेंद्र चोल ने सैन्य विस्तार पर ज्यादा बल दिया और अपने सम्राज्य को मजबूत किया।
 
हालांकि, उस समय उसके सामने चुनौतियां कम न थीं वहां राज्यों पर कब्जा करने और वर्चस्व की लड़ाई जारी थी, फिर भी उसने अपनी सेना को मजबूत किया और समुद्र से सुरक्षा के लिए एक नौसेनिक बेड़े की स्थापना की। अपने विशाल समुद्री बेड़े से चोल साम्राज्य ने कई दक्षिण एशियाई शासकों-प्रायद्वीपों के विरूद्ध लड़ाई लड़ी और उनमें विजयश्री हासिल की। बारहवीं सदी तक चोल साम्राज्य में सबकुछ ठीक-ठाक रहा और वह निरंतर प्रगति के पथ पर बढ़ते रहे, किन्तु आगे वह धीरे-धीरे कमजोर होने लगे। उन्हें चालुक्यों व होयसलों की शत्रुता का सामना करना पड़ा।
 
इस दौर को वह संभाल न पाए और 1267 ईस्वी आते-आते उनका केंद्रीय शासन पूरी तरह से लचर हो गया।  इसका फायदा उठाते हुए 1310 ईस्वी के आसपास अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफूर ने उन पर आक्रमण कर, उनका पतन कर दिया।
 
 

The mighty Kshatriya king Raja Chola I

Dynasty                         : Chola Dynasty
Government Period   : 985 AD to 1014 AD
Title                              : Rajakesari
Capital                         : Tanjore
Predecessor                : Uttam Chola
Successor                    : Rajendra Chola I
Father                         : Sundar Chola
Queens                       : Lokmahadevi, Cholmahadevi, Trailokmahadevi, Panchwanmahadevi, Abhimanavalli, Eadamadeviar, Prithvimahadevi
Children                    : Rajendra Chola I, Kundavai Madevadigal
Childhood Name     : Arulmojahivarman
Death                         : 1014 AD

क्षत्रिय कोली केशो नाईक: ब्रिटिशराज समय मे भारत का "रोबिन हुड" -Kshatriya Koli Kesho Naik: India's "Robin Hood" in British Raj time

June 01, 2020 0
क्षत्रिय कोली केशो नाईक: ब्रिटिशराज समय मे  भारत का "रोबिन हुड" -Kshatriya Koli Kesho Naik: India's "Robin Hood" in British Raj time
क्षत्रिय कोली केशो नाईक भारत मे ब्रिटिशराज के समय महाराष्ट्र का एक सूप्रसिद्ध डाकू था।
 
जिसके उपर १९१२ मे इंग्लैंड मे किताब लिखी गई जिसका नाम  The Exploits Of The Kesho Naik: The Dacoit है। नाईक को भारत का "रोबिन हुड" के नाम से जाना जाता था और साथ ही लोग उसे दक्कन का शेर बुलाते थे।
 
अमीर लोगों को लूटकर गरीब लोगों मे बांट देता था :
नाईक का जन्म महाराष्ट्र के एक कोली  परिवार मे हुआ था। नाईक ने ब्रिटिश सरकार की ट्रेन लूटी थी जिसमें सोना ले जाया जा रहा था और लोगों मे बांट दिया। केशो नाईक भ्रष्ट अमीर लोगों को लूटकर ज्यादातर गरीब लोगों मे बांट दिया करता थी जिसके कारण कोई भी उसके खिलाफ सरकार का साथ नही देता था। वह गले मे सोने की जंजीर पहनने का बोहोत शोकीन था। नाईक ने गरीबों के तंग करने‌ वाले साहूकारों की नाक भी काटीं थी और ब्रिटिश सरकार ने उस पर ५०००(5000)  रुपए का इनाम घोषित किया था जिंदा या मुर्दा। ब्रिटिश सरकार ने नाईक को जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए कैप्टन ट्रेंच को ब्रिटिश सेना के साथ भेजा। नाईक को पता चला तो नाईक ने गरीब मुसलमान व्यक्ति की भेष-भूषा बनाई और कैप्टन के पास मदद मांगने गया और जब ट्रेंच मदद करने के लिए गया तो नाईक ने कैप्टन के सर पर बंदूक तान दी लेकिन नाईक ने उसे मारा नही और साथ मिलने का प्रस्ताव रखा।
 
सोने से भरी ट्रेन की लूट:
हर पंद्रह दिन बाद मिजौर की खानों से सोना खोदकर बोम्बे  लाया जाता था और फिर वहां से समुद्री जहाज के सहारे इंग्लैंड भेज दिया जाता था। जिसे देखकर नाईक बोला की हमारे देश के सबसे बड़े चोर तो है जिसके बाद नाईक ने ट्रेन लुटने की योजना बनाई। नाईक का एक रेलवे मे काम भी कर चुका था जिससे उसे और आसानी हो गई। ट्रेन मे सोना काफी ज्यादा था इसके लिए नाईक ने १५ और साथी इकट्ठे किए। नाईक को पता चला की ट्रेन रात दो बजे बिलगी स्टेशन पर आएगी। नाईक ने ट्रेन रुकवाने की योजना बनाई। जब ट्रेन रात दो बजे स्टेशन पर पहुंचले वाली थी तो नाईक ने स्टेशन मास्टर को मार डाला और सिग्नल लाल कर दिए जिसके बाद ट्रेन की गती धीमी पड़ती गई। इसके बाद नाईक और साथीयों ने ट्रेन लूट ली।
 
साहुकार के  पैसे और जेवरात गांव के लोगों मे बांट देना: 
केशो नाईक को एक पत्र मिला जिसमें बागीवाडी गांव के साहूकार देवीदास के अत्याचारों का गुणगान था जिसके बाद नाईक बागीवाडी के लिए रवाना हो गए और एक व्यापारी का भेष बना लिया। नाईक ने एक दिन के लिए बागीवाडी गांव के एक गरीब परिवार के यहां शरन ली जहां उसे पता चला की साहूकार बोहत बदमाश है और व्याज पर व्याज चढ़ाए जाता है और कोई इंकार करे तो अपने कागज सरकार को दिखाकर सरकार की मदद लेता है और लोगों की जमीन भी जब्त कर लेता है जिसके बाद नाईक को बिस्वास हो गया की साहुकार बुरा व्यक्ति है। एक पवित्र आदमी का भेष बनाया और साहुकार के घर में प्रवेश कर गया। उसके बाद उसने वहां देखा की साहुकार ने झुंटे कागज बना रखें है व्यर्थ का व्याज लोगों पर चढ़ा रखा है। नाईक ने अपने साथीयों को बुलाकर साहुकार के सारे कागज दस्तावेजों को जला दिया ताकी वह सरकार के सहारे लोगों से व्यर्थ का व्याज ना ले सके और उसके बाद नाईक ने साथीयों के साथ मिलकर साहुकार के सारे पैसे और जेवरात लेकर गांव के लोगों मे बांट दिए जिसके बाद गांव के लोगों ने जय केशोजी जय केशोजी के नारे लगाकर नाईक का सम्मान किया और साथ ही नाईक ने काली देवी के मंदिर का निर्माण भी करवाया। इसके बाद साहुकार ने पुलिस को बुलाया लेकिन नाईक को नहीं पकड़ पाए।
 
रोहा का राजा वाजीराव के भेष मे:
केशो नाईक को अखबारों से खबर मिली की ब्रिटिश राजदरबार लगाया जाएगा ज़हां सभी छोटे बड़े राजा महाराजा आएंगे और तभी नाईक के दिमाग मे अपने आप को और मसहूर करने का तरीका सूजा। उसने योजना बनाई की किसी तरह से दरबार मे सामिल हुआ जाए और वहां डाकू केशो नाईक की शिकायत की जाए। कुछ समय बाद पता चला की रोहा का राजा वाजीराव कुछ कुछ उसकी तरह दिखता है तो वह रोहा गया और एक संत बन गया क्योंकि रोहा का वाजीराव काफी ज्यादा धार्मिक व्यक्ति था और हिन्दू धर्म के अनुसार ही चलता था। वाजीराव दरबार मे जाने की तैयारियां मे लगा हुआ था और बोहोत उत्साहित था तभी नाईक संत के भेष मे वाजीराव के पास गया और सलाम भी नही किया जिससे वाजीराव चोंक गया। वाजीराव बोला कया चाहिए महाराज तो नाईक संत ने कहा तुम्हारा समय खराब चल रहा है अगर तुम दरबार गए तो पक्का लुम मारे जाओगे जिसके बाद वाजीराव ने अंग्रेजों के पास संदेश भेजा की हम दरबार में उपस्थित नही हो सकते क्योंकि हमारी तबीयत ख़राब है। उसके बाद नाईक ने वाजीराव के हाथी के सारथी को १०० रुपए दिए और सारथी ने कभी १०० रुपए कभी देखे नही थे तो वह दरबार में चलने को राजी हो गया। नाईक राजा के भेष मे दरबार मे प्रवेश कर रहा था तभी दरबारी ने नाईक से पहचान पुंछते हुए कार्ड मांगा तो नाईक ने दिखाते हुए 'हम रोहा के वाजीराव हैं' बोला और प्रवेश कर गये। जब दरबार चालू हुआ तो नाईक ने हिज हाइनेस से कहा महाराज आपकी कृपा से सब ठीक है परंतु ब्रिटिश राज का एक डांकू है जिसने हमारे राज्य मे आतंक मचा रखा है कृपया करके उसे रोकें और हमारे राज्य को सुरक्षित रखने मे सहयोग दें। हिज हाइनेस ने पूंछा कोन है वह डकैत तो नाईक ने उत्तर दिया महाराज उसका नाम केशो नाईक है जिसके बाद दरबार मे केशो नाईक के चरचे होने लगे और दरबार खारीज हुआ। ब्रिटिश सरकार ने रोहा राज्य मे सेना तैनात कर दी और तोपों को भी भेज दिया जिसे देखकर राजा वाजीराव घवरा गया। वाजीराव ने अंग्रेजी अफसर से पुंछा कया हुआ तो आफसर बोला हिज हाइनेस ने आपकी मदद मे यह सब भेजा है तो वाजीराव बोला मे तो दरबार मे गया ही नही जिसके बाद नाईक के बारे मे सब पता चला।
 
चांदी के सिक्के  सड़कों पर गरीब जनता मे  लुटाए:
केशो नाईक ने दरबार मे प्रवेश करने से पहले राजा बनकर चांदी के सिक्के सड़कों पर लुटाए थे तो गरीब जनता बुरी तरह से टूट पड़ी थी जिस कारण नाईक ने सारे सिक्के लुटा दिए और बार मे ट्रेन की लूट से जो बचा हुआ था बो भी लुटा दिया तब नाईक ने लोगों की ग़रीबी पर बिचार किया और खजाने लुटने पर योजना बनाई। केशो को पता था की सरकार हर जिले में सरकारी खज़ाना रखती है तो नाईक ने दिक्साल के ख़ज़ाने को निशाना बनाया। नाईक का एक साथी रामभाऊ ही एसा था जो पढ़ा लिखा था और उसने पहले सरकारी खजाने के लिए नौकरी भी की थी तो नाईक ने रामभाऊ को दिक्साल के ख़ज़ाने के कार्यालय पर चपरासी की नौकरी पर लगा दिया और खुद सिपाही बन गया। एक दिन खजाना दिक्साल से #ट्रिंबक ले जाया जा रहा था तो #नाईक भी सिपाही बनकर चल दिया तो अफसर ने पुंछा तुम कोन हो, नाईक बोला साहब मे नया सिपाही हुं' परंतु अफसर को कोई भी रिकोर्ड नही मिला पर नाईक को सिपाही पर रख लिया। जब खजाना दिक्साल और ट्रिंबक के बीच मे था तभी नाईक ने अपने साथीयों को बुलाकर हमला कर दिया जिसके बाद #ब्रिटिश सेना बुलाई गई लेकिन नाईक अफसर और सिपाहियों को मारकर खजाना लेकर भाग गया जिसमे १२००० रुपए और जेवरात थे और गरीबों में बांट दिया।

क्षत्रिय-राजपूत गौतम वँश : जिसमे राजा सिद्धार्थ का जन्म हुआ

June 01, 2020 0
क्षत्रिय-राजपूत गौतम वँश : जिसमे राजा सिद्धार्थ का जन्म हुआ

क्षत्रिय-राजपूत गौतम वँश  जिसमे  राजा सिद्धार्थ का जन्म हुआ था और बाद मे वो ही "महात्मा बुद्ध" बने थे।

  • गौतम वँश।
    • वंश           :-  सूर्यवंश,इक्ष्वाकु ,शाक्य
    • गोत्र           :-  गौतम
    • प्रचर पाँच  :-  गौतम , आग्डिरस , अप्सार,बार्हस्पत्य, ध्रुव
    • कुलदेवी    :- चामुण्ङा माता,बन्दी माता,दुर्गा माता
    • देवता        :-  महादेव योगेश्वर,श्रीरामचन्द्र जी
    • वेद            :- यजुर्वेद
    • शाखा        :- वाजसनेयी
    • प्रसिद्ध महापुरुष  :-  गौतम बुद्ध
    • सुत्र           :- पारस्करगृहासूत्र
    • गौतम वंश का महामंत्र:-

रेणुका: सूकरह काशी काल बटेश्वर:।

कालिंजर महाकाय अश्वबलांगनव मुक्तद:॥

    • प्राचीन राज्य    :-  कपिलवस्तु, अर्गल, मेहनगर, कोरांव,बारां(उन्नाव),लशकरपुर ओईया(बदायूं)
    • निवास            :-  अवध,रुहेलखण्ड,पूर्वांचल,बिहार,मध्य प्रदेश
    • शाखाएं           :-  कंडवार, गौनिहां, रावत,अंटैया,गौतमिया  आदि
    • प्राचीन शाखाएं :-  मोरी(मौर्य),परमार(सम्भवत)
                 1891 की जनगणना में यूपी में कुल 51970 गौतम राजपूत थे अब करीब दो से ढाई लाख होंगे,इसमें बिहार और मध्य प्रदेश के गौतम राजपूतो की संख्या भी जोड़ ले तो करीब 350000 गौतम राजपूतो की संख्या देश भर में होगी।
 
  • गौतम बुद्ध का जन्म भी इसी वंश में हुआ था।
वंश भास्कर के अनुसार---भगवान राम के किसी वंशज ने प्राचीन काल मे अपना राज्य नेपाल मे स्थापित किया ।
इसी वंश मे महाराणा शाक्य सिंह हुए जिनके नाम से यह शाक्य वंश कहा जाने लगा।  इसकी राजधानी कपिलवस्तु ( गोरखपुर ) थी। इसी वंश में आगे चलकर शुध्दोधन हुये जिनकी बडी रानी से सिद्धार्थ उत्पन्न हुये जो " गौतम " नाम से सुविख्यात हुये । जो संसार से विरक्त होकर प्रभु भक्ति में लीन हो गये । संसार से विरक्त होने से पहले इनकी रानी यशोधरा को पुत्र (राहुल ) उत्पन्न हो चुका था। इन्हीं गौतम बुद्ध  के वंशज  " गौतम " राजपूत कहलाते हैं । इस वंश में राव, रावत, राणा, राजा  आदि पदवी प्राप्त घराने हैं ।
 
  • गौतम सूर्यंवंशी राजपूत हैं ये अयोधया के सूर्यवंश से अलग हुई शाखा है इन्हें पहले शाक्य वंश भी कहा जाता है।
             गौतम ऋषि द्वारा दीक्षित होने के कारण इनका ऋषि गोत्र गौतम हुआ जिसके बाद ये गौतम क्षत्रिय कहलाए जाने लगे।
अश्वघोष के अनुसार गौतम गोत्री कपिल नामक तपस्वी मुनि अपने माहात्म्य के कारण दीर्घतपस के समान और अपनी बुद्धि के कारण काव्य (शुक्र) तथा अंगिरस के समान था| उसका आश्रम हिमालय के पार्श्व में था| कई इक्ष्वाकु-वंशी राजपुत्र मातृद्वेष के कारण और अपने पिता के सत्य की रक्षा के निमित्त राजलक्ष्मी का परित्याग कर उस आश्रम में जा रहे| कपिल उनका उपाध्याय (गुरु) हुआ, जिससे वे राजकुमार, जो पहले कौत्स-गोत्री थे, अब अपने गुरु के गोत्र के अनुसार गौतम-गोत्री कहलाये| एक ही पिता के पुत्र भिन्न-भिन्न गुरुओं के कारण भिन्न भिन्न गोत्र के हो जाते है, जैसे कि राम (बलराम) का गोत्र "गाग्र्य" और वासुभद्र (कृष्ण) का "गौतम" हुआ| जिस आश्रम में उन राजपुत्रों ने निवास किया, वह "शाक" नामक वृक्षों से आच्छादित होने के कारण वे इक्ष्वाकुवंशी "शाक्य" नाम से प्रसिद्ध हुये| गौतम गोत्री कपिल ने अपने वंश की प्रथा के अनुसार उन राजपुत्रों के संस्कार किये और उक्त मुनि तथा उन क्षत्रिय-पुंगव राजपुत्रों के कारण उस आश्रम ने एक साथ "ब्रह्मक्षत्र" की शोभा धारण की
  • अर्गल राज्य की स्थापना।
शाक्य राज्य पर कोशल नरेश विभग्ग द्वारा आक्रमण कर इसे नष्ट कर दिया गया था जिसके बाद बचे हुए शाक्य गौतम क्षत्रियों द्वारा अमृतोदन के पुत्र पाण्डु के नेतृत्व में अर्गल राज्य की स्थापना की गयी।अर्गल आज के पूर्वांचल के फतेहपुर जिले में स्थित है।
प्रसिद्ध गौतम राजा अंगददेव ने अपने नाम का रिन्द नदी के किनारे "अर्गल" नाम की आबादी को आबाद करवाया और गौतम के खानदान की राजधानी स्थापित किया राजा अंगददेव की लडकी अंगारमती राजा कर्णदेव को ब्याही थी। राजा अंगददेव ने अर्गल से ३मील दक्षिण की तरफ एक किला बनवाया और इस किले का नाम "सीकरी कोट" यह किला गए में ध्वंसावशेष के रूप में आज भी विद्यमान है।
    1. राजा अंगददेव
    2. बलिभद्रदेव
    3. राजा श्रीमानदेव
    4. राजा ध्वजमान देव
    5. राजा शिवमान देव ने अर्गल से १मील दक्षिण रिन्द नदी के किनारे अर्गलेश्वर महादेव का मन्दिर बनवाया यहाँ आज भी शिवव्रत का मेला लगता है।अर्गल राजा कलिंग देव ने रिन्द नदी के किनारे कोडे (कोरा) का किला बनवाया।
  • 13वीं शताब्दी में अर्गल राज्य।
13वीं शताब्दी में भरो द्वारा अर्गल का हिस्सा दबा लिया था।उस समय अर्गल राज्य में अवध क्षेत्र के कन्नौज के रायबरेली फतेहपुर बांदा के कुछ क्षेत्र आते थे।
1320 के पास अर्गल के गौतम राजा नचिकेत सिंह व बैस ठाकुर अभय सिंह व निर्भय सिंह का जिक्र आता है। उस समय बैसवारा में सम्राट हर्षवर्धन के वंशज बैस ठाकुरों का उदय हो रहा था। उनके नाम पर ही इस क्षेत्र को बैसवारा क्षेत्र कहा गया। एक युद्ध में नचिकेत सिंह और उनकी पत्नी को गंगा स्नान के समय विरोधी मुस्लिम सेना ने घेर लिया तो निर्भय व अभय सिंह ने उन्हें बचाया था। इसमें निर्भय सिंह को वीर गति प्राप्त हुई थी। राजा ने अभय सिंह की बहादुरी से खुश होकर उन्हें अपनी पुत्री ब्याह दी और दहेज में उसे डौडिया खेड़ा का क्षेत्र सहित रायबरेली के 24 परगना (उस समय यह रायबरेली में आता था) और
फतेहपुर का आशा खेड़ा का राजा बनाया था। 1323 ईसवी में अभय सिंह बैस यहां के राजा हुए थे। यह पूरा क्षेत्र भरों से खाली कराने में अभय सिंह की दो पीढिया लगीं। इसके बाद आगे की पीढ़ी में मर्दन सिंह का जिक्र आता है।
  • मुगलो के अधिपत्य में अर्गल राज्य और आजमगढ़ राज्य की नीव।
अर्गल के गौतम राजा द्वारा चौसा के युद्ध में हुमायूँ को हराया गया जिससे शेरशाह सूरी को मुगलो को अपदस्थ कर भारत का सम्राट बनने में सहायता मिली।
जब मुगलों का भारत में दुबारा अधिपत्य हुआ तो उन्होंने बदले की भावना से अर्गल राज्य पर हमला किया और यह राज्य नष्ट हो गया।
फिर भी बस्ती गोरखपुर क्षेत्र में गौतम राजपूतो की प्रभुसत्ता बनी रही और ब्रिटिश काल तक गौतम राजपूतो के एक जमीदार परिवार शिवराम सिंह "लाला" को अर्गल नरेश की उपाधि बनी रही।
अर्गल के गौतम राजपूतो की एक शाखा पूर्वांचल गयी वहां मेहनगर के राजा विक्रमजीत गौतम ने किसी मुस्लिम स्त्री से विवाह कर लिया जिससे उन्हें राजपूत समाज से बाहर कर दिया गया। विक्रमजीत की मुस्लिम पत्नी के पुत्र ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया जिसका नाम आजम खान रखा गया।
इसी आजम खान ने आजमगढ़ राज्य की नीव रखी।
इस क्षेत्र के गौतम राजपूतों ने ओरंगजेब का भी मुकाबला किया था।
उत्तराधिकार संघर्ष में शाह शुजा भागकर फतेहपुर आया था जिसे गौतम राजपूतो ने शरण दी थी।जिसके बाद ओरंगजेब की 90000 सेना ने हमला किया जिसका 2 हजार गौतम राजपूतो द्वारा वीरता से मुकाबला किया गया।इसमें हिन्दू राजपूतो के साथ मुस्लिम गौतम ठाकुरों ने भी कन्धे से कन्धा मिलाकर जंग लड़ी।बाद में यहाँ के गौतम राजपूतो ने अंग्रेजो का भी जमकर मुकाबला किया और बगावत के कारण एक इमली के पेड़ पर 52 गौतम राजपूतो को अंग्रेजो द्वारा फांसी की सजा दी गयी।
  • अंग्रेज सरकार और  1857 के स्वतन्त्रता।
बस्ती जिले में नगर के गौतम राजा प्रताप नारायण सिंह ने 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम में अंग्रेजो के विरुद्ध क्रांति में बढ़ चढ़कर भाग लिया तथा अंग्रेजो को कई बार मात दी।लेकिन उनके कुछ दुष्ट सहयोगियों द्वारा विश्वासघात करने के कारण वो पकड़े गए तथा उन्हें अंग्रेजो द्वारा मृत्युदण्ड की सजा दी गयी।
  • आज के समय में  गौतम राजपूत की बस्ती।
             ◘ आज गौतम राजपूत गाजीपुर, फतेहपुर , मुरादाबाद , बदायुं, कानपुर , बलिया , आजमगढ़ , फैजाबाद , बांदा, प्रतापगढ, फर्रूखाबाद, शाहाबाद, गोरखपुर , बनारस , बहराइच, जिले(उत्तर प्रदेश )
            ◘ आरा, छपरा, दरभंगा(बिहार )
            ◘ चन्द्रपुरा, नारायण गढ( मंदसौर), रायपुर (मध्यप्रदेश ) आदि जिलों में बासे हैं ।
            ◘ "कण्ङवार" - दूधेला, पहाड़ी चक जिला छपरा बिहार में बहुसंख्या में बसे हैं ।
            ◘ चन्द्रपुरा, नारायण गढ( मंदसौर) में उत्तर प्रदेश के फतेहपुर से आकर गौतम राजपूत बसे हैं ।
            ◘ कुछ गौतम राजपूत पंजाब के पटियाला और हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर हमीरपुर कांगड़ा चम्बा में भी मिलते हैं
  • गौतम क्षत्रिय की खापें।
  1. गौतमिया गौतम    :- उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ और गोरखपुर जिलों में हैं।
  2. गोनिहा गौतम       :- बलिया,शाहबाद (बिहार) आदि जिलों में हैं।
  3. कण्डवार गौतम    :- कण्डावेनघाट  के पास रहने वाले गौतम क्षत्रिय कण्डवार गौतम कहे जाने लगे। ये बिहार के छपरा आदि जिलों में हैं।
  4. अण्टैया गौतम      :-  इन्होंने अपनी जागीर अंटसंट (व्यर्थ) में खो दी।इसीलिए अण्टैया गौतम कहलाते हैं।ये सरयू नदी के किनारे चकिया, श्रीनगर,जमालपुर,नारायणगढ़ आदि गांवों में बताये गए हैं।
  5. मौर्य गौतम          :- इस वंश के क्षत्रिय उत्तर प्रदेश के मथुरा,फतेहपुर सीकरी,मध्य प्रदेश के उज्जैन,इन्दौर,तथा निमाड़ बिहार के आरा जिलों में पाए जाते हैं।
  6. रावत क्षत्रिय        :- गौत्र - भारद्वाज। प्रवर - तीन - भारद्वाज, वृहस्पति, अंगीरस। वेद -यजुर्वेद। देवी -चण्डी। गौतम वंश की उपशाखा है। इन क्षत्रियों का निवास उन्नाव तथा फ़तेहपुर जिलों में हैं।
 

क्षत्रिय कोली विद्रोह : सन् 1828

June 01, 2020 0
क्षत्रिय कोली विद्रोह : सन् 1828

1828 का क्षत्रिय कोली विद्रोह

मुख्य स्थान          :- नागपुर                                                                                                                 

विद्रोह का प्रभाव  :- पलामू, हजारीबाग, सिंहभूम

विद्रोह का नेतृत्व  :- क्षत्रिय कोली सरदार गोवींद राव  ,नारायण राव , गोमध कुंवर।

विद्रोह का कारण :- कोली की जमीन छीनकर मुस्लिमो तथा सिक्खों को दे दी गई।

1828 का क्षत्रिय कोली विद्रोह सन् 1828 मे महाराष्ट्र के क्षत्रिय कोली (Koli)  सरदार  गोवींद राव खरे के नेतृत्व में किया गया था  और  इसी समय कोली के लोग डाकु बन गए थे। सरदार गोवींद राव खरे पेशवा का किलेदार (Fort Commander) हुवा करते थे और रतनगढ़ क़िला क्षत्रिय कोली के रक्षन मे रहता था ।जब अंग्रेजों ने पेशवा को विफल कर दिया उसके बाद क्षत्रिय कोलीयो ने विद्रोह सुरु कर दिया। क्षत्रिय कोली पहाड़ीयों में चले गए और अंग्रेजों को मारने और काटने लगे । क्षत्रिय कोलीयों के आतंक और क्षत्रिय कोली विद्रोह को दफ़न करने के लिए अंग्रेजी अधिकारियों ने कैप्टन मैकिंटस (Captain Macintosh) को अंग्रेजी सेना के साथ भेजा लेकिन कैप्टन मैकिंटस को बुरी तरह हार मिली और उसकी काफ़ी सेना भी मारी गई। लड़ाई के बाद अंग्रेजों को महसूस हुआ कि क्षत्रिय कोलीयों को दबाना इतना आसान नहीं है इसलिए अंग्रेजों ने चाल चली और गांव-गांव जाकर क्षत्रिय कोली विद्रोहीयों के बारे में जानकारी एकठा करने लगे लेकिन अंग्रेजों को किसी ने भी कुछ नहीं बताया। मगर कुलकर्णी ब्राह्मणों ने अंग्रेजों को सारी जानकारी दे दी कि क्षत्रिय कोली कहां खाते हैं, कहां जाते हैं , कहां रहते हैं , कहां पिते हैं । वैसे तो कुलकर्णी ब्राह्मणों के पास ज्यादा जानकारी नहीं थी लेकिन जो भी जानकारी थी सारी अंग्रेजों को दे दी और उसी के आधार पर अंग्रेजों ने अकोला की पहाड़ियों में दुबारा से और ज्यादा सेना भेजी और क्षत्रिय कोलीयों पर हमला कर दिया। हमले में क्षत्रिय कोली सरदार गोवींद राव खरे मारा गया और इस कारण क्षत्रिय कोलीयों का मनोबल टुट गया। अंग्रेजों ने बागी क्षत्रिय कोलीयों को बंदुक की गोलियों से मार डाला और बचे कुचों कोलीयों को गिरफ्तार कर लिया। इस प्रकार 1828 का क्षत्रिय कोली विद्रोह दफन हुआ।

1858 में सिंध, पाकिस्तान के क्षत्रिय कोली का ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह

June 01, 2020 0
1858 में सिंध, पाकिस्तान के क्षत्रिय कोली का ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह
  • 1858 विद्रोह और रुपलो क्षत्रिय कोल्ही:

1858 में सिंध, पाकिस्तान के क्षत्रिय कोली जाती के लोगो ने अंग्रेजी हुकूमत के सामने हथियार उठाए थे। जब मीर राजाओं को अंग्रेजों ने मार डाला तो सिंध के क्षत्रिय कोलीयो ने अंग्रेजों के खिलाफ बड़ी संख्या में एक होकर लड़ना सुरु कर दिया । रुपलो क्षत्रिय कोल्ही (Rooplo Kolhi) नाम के कोली सरदार ने 8000 क्षत्रिय कोलीयो की फोज खड़ी कर दी। क्षत्रिय कोली जाति की फोज ने अंग्रेजों के राजस्व कार्यालय पर, पुलिस स्टेशनों पर,टेलीग्राफ कार्यालयों पर हमला कर दिया और उन पर कब्जा कर लिया। फिर जनरल टायरविट ने 15 अप्रैल की रात को क्षत्रिय कोलियों पर हमला किया, लेकिन क्षत्रिय कोलियो ने अंग्रेजों को बुरी तरह से मारा और अंग्रेजी सेना का एक बहुत हिस्सा मारा गया था, इसलिए अपनी जान बचाने के लिए जनरल टायरविट हैदराबाद भाग गए।

  • क्षत्रिय कोलियो का विद्रोह निष्फल होने का कारण:

हैदराबाद में, जनरल टायरविट ने एक बड़ी सेना तैयार की और हमले की तैयारी शुरू कर दी। और भदेसर (भदेसर) की राजपूत जाति के लोग धन और जमीन के लालच में अंग्रेजों से जुड़ गये। इसके बाद, अंग्रेजी सेना और राजपूत लोगों ने साथ मिलकार क्षत्रिय कोलियॉ के नगरपारकर क्षेत्र को घेर लिया और में क्षत्रिय कोलियों पर हमला किया जिसमें बड़ी संख्या में क्षत्रिय कोलि मारे गए और क्षत्रिय कोलीयो के एक गांव को पूरी तरह से बरबाद कर दिया।जो क्षत्रिय कोली स्वतंत्रता सेनानी बचकर निकल गए थे फिर उनकी तलाश सुरु कर दी और लोकल राजपूतों ने अंग्रेजों को Pag Wool Well के बारे म बताया औरबहां अंग्रेजों ने बचे हुए क्षत्रिय कोलीयो को भी बंदी बना लियाया मार दिया। क्षत्रिय कोली सरदार रुपलो कोल्ही को बंदी बना कर ले गए और 22 August 1858 को फांसी पर चढ़ा दिया। और राजपूतों को ईनाम के तौर पर ज़मीनें और पैसे दिए।

क्षत्रिय कोली राजपूत: महाभारत के युग के उपरान्त

June 01, 2020 0
क्षत्रिय कोली राजपूत: महाभारत के युग के उपरान्त
  • महाभारत  युग के बाद क्रांतिकारी परिवर्तन।
महाभारत के युग के उपरान्त इस सम्पूर्ण क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ। कोशल राज्य के अधीन अनेक छोटे-छोटे गणतंत्रात्मक राज्य असितत्व में आये, जिसमें कपिलवस्तु के क्षत्रिय शाक्यों और रामग्राम के क्षत्रिय कोलियों का राज्य वर्तमान महराजगंज जनपद की सीमाओं में भी विस्तृत था। क्षत्रिय शाक्य एवं क्षत्रिय कोलिय गणराज्य की राजधानी रामग्राम की पहचान की समस्या अब भी उलझी हुई है। डा. राम बली पांडेय ने रामग्राम को गोरखपुर के समीप स्थित रामगढ़ ताल से समीकृत करने का प्रयास किया है किन्तु आधुनिक शोधों ने इस समस्या को नि:सार बना दिया है। क्षत्रिय कोलिय का सम्बंध देवदह नामक नगर से भी था। बौद्धगंथों में भगवान गौतम बुद्ध की माता महामाया, मौसी महाप्रजापति गौतमी एवं पत्नी भद्रा कात्यायनी (यशोधरा) को देवदह नगर से ही सम्बनिधत बताया गया है। महराजगंज जनपद के अड्डा बाजार के समीप स्थित बनसिहा- कला में 88.8 एकड़ भूमि पर एक नगर, किले एवं स्तूप के अवशेष उपलब्ध हुए हैं। 1992 में डा. लाल चन्द्र सिंह के नेतृत्व में किये गये प्रारंभिक उत्खनन से यहां टीले के निचते स्तर से उत्तरी कृष्णवणीय मृदमाण्ड (एन.बी.पी.) पात्र- परम्परा के अवशेष उपलब्ध हुए हैं गोरखपुर विश्वविधालय के प्राचीन इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष डा. सी.डी.चटर्जी ने देवदह की पहचान बरसिहा कला से ही करने का आग्रह किया। महराजगंज में दिनांक 27-2-97 को आयोजित देवदह-रामग्राम महोत्सव गोष्ठी में डा. शिवाजी ने भी इसी स्थल को देवदह से समीकृत करने का प्रस्ताव रखा था। सिंहली गाथाओं में देवदह को लुम्बिनी समीप स्थित बताया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि देवदह नगर कपिलवस्तु एवं लुम्बिनी को मिलाने वाली रेखा में ही पूर्व की ओर स्थित रहा होगा। श्री विजय कुमार ने देवदह के जनपद के धैरहरा एंव त्रिलोकपुर में स्थित होने की संभावना व्यक्त की है। पालि-ग्रन्थों में देवदह के महाराज अंजन का विवरण प्राप्त होता है। जिनके दौहित्र गौतम बुद्ध थे। प्रो. दयानाथ त्रिपाठी की मान्यता है कि महाराज अंजन की गणभूमि ही कलांतर में विकृत होकर महाराजगंज एवं अंन्तत: महाराजगंज के रूप परिणित हुई। फारसी भाषा का गंज शब्द बाजार, अनाज की मंडी, भंडार अथवा खजाने के अर्थ में प्रयुक्त है जो महाराजा अंजन के खजाने अथवा प्रमुख विकय केन्द्र होने के कारण मुसिलम काल में गंज शब्द से जुड़ गया। जिसका अभिलेखीय प्रमाण भी उपलब्ध है। ज्ञातव्य हो कि शोडास के मथुरा पाषाण लेख में गंजवर नामक पदाधिकारी का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है। छठी शताब्दी ई0 में पूर्व में अन्य गणतंत्रों की भांति कोलिय गणतंत्र भी एक सुनिश्चित भोगौलिक इकाई के रूप में स्थित था। यहां का शासन कतिपय कुलीन नागरिकों के निर्णयानुसार संचालित होता था। तत्कालीन गणतंत्रों की शासन प्रणाली एवं प्रक्रिया से स्पष्टत: प्रमाणित होता है कि जनतंत्र बुद्ध अत्यन्त लोकप्रिय थे। इसका प्रमाण बौद्ध ग्रंथों में वर्णित शक्यो एवं कोलियों के बीच रोहिणी नदी के जल के बटवारें को लेकर उत्पन्न विवाद को सुलझाने में महात्मा बुद्ध की सक्रिय एवं प्रभावी भूमिका में दर्शनीय है। इस घटना से यह भी प्रमाणित हो जाता है कि इस क्षेत्र के निवासी अति प्राचीन काल से ही कृषि कर्म के प्रति जागरूक थे। कुशीनगर के बुद्ध के परिनिर्वाण के उपरांत उनके पवित्र अवशेष का एक भाग प्राप्त करने के उद्देश्य से जनपद के कोलियों का दूत भी कुशीनगर पहुंचा था। कोलियों ने भगवान बुद्ध क पवित्र अवशेषों के ऊपर रामग्राम में एक स्तूप निर्मित किया था, जिसका उल्लेख फाहियान एवं हवेनसांग ने अपने विवरणों में किया है। निरायवली-सूत्र नामक ग्रंथ से ज्ञात होता है कि जब कोशल नरेश अजातशत्रु ने वैशाली के लिचिछवियों पर आक्रमण किया था, उस समय लिचिछवि गणप्रमुख चेटक ने अजातशत्रु के विरूद्व युद्ध करने के लिए अट्ठारह गणराज्यों का आहवान किया था। इस संघ में कोलिय गणराज्य भी सम्मिलित था। छठी षताब्दी ई. पूर्व के उपरांत राजनीतिक एकीकरण की जो प्रक्रिया प्रारम्भ हुई उसकी चरम परिणति अशोक द्वारा कलिंग युद्ध के अनंतर शास्त्र का सदा के लिए तिलांजलि द्वारा हुआ। महराजगंज जनपद का यह संपूर्ण क्षेत्र नंदों एवं मौर्य सम्राटों के अधीन रहा। फाहियान एंव हवेनसांग ने सम्राट अशोक के रामग्राम आने एवं उसके द्वारा रामग्राम स्तूप की धातुओं को निकालने के प्रयास का उल्लेख किया है। अश्वघोष के द्वारा लिखित बुद्ध चरित (28/66) में वर्णित है कि समीप के कुण्ड में निवास करने वाले एवं स्तूप की रक्षा करने की नाग की प्रार्थना से द्रवित होकर उसने अपने संकल्प की परित्याग कर दिया था।
Source : महाराज गंज का इतिहास

क्षत्रिय कोली राजपूत: महाभारत के युग के उपरान्त

महाभारत  युग के बाद क्रांतिकारी परिवर्तन। महाभारत के युग के उपरान्त इस सम्पूर्ण क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ। कोशल राज्य के अधीन अने...