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Thursday, August 6, 2020

क्षत्रिय कोली राजपूत: महाभारत के युग के उपरान्त

August 06, 2020 0
क्षत्रिय कोली राजपूत: महाभारत के युग के उपरान्त
  • महाभारत  युग के बाद क्रांतिकारी परिवर्तन।
महाभारत के युग के उपरान्त इस सम्पूर्ण क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ। कोशल राज्य के अधीन अनेक छोटे-छोटे गणतंत्रात्मक राज्य असितत्व में आये, जिसमें कपिलवस्तु के क्षत्रिय शाक्यों और रामग्राम के क्षत्रिय कोलियों का राज्य वर्तमान महराजगंज जनपद की सीमाओं में भी विस्तृत था। क्षत्रिय शाक्य एवं क्षत्रिय कोलिय गणराज्य की राजधानी रामग्राम की पहचान की समस्या अब भी उलझी हुई है। डा. राम बली पांडेय ने रामग्राम को गोरखपुर के समीप स्थित रामगढ़ ताल से समीकृत करने का प्रयास किया है किन्तु आधुनिक शोधों ने इस समस्या को नि:सार बना दिया है। क्षत्रिय कोलिय का सम्बंध देवदह नामक नगर से भी था। बौद्धगंथों में भगवान गौतम बुद्ध की माता महामाया, मौसी महाप्रजापति गौतमी एवं पत्नी भद्रा कात्यायनी (यशोधरा) को देवदह नगर से ही सम्बनिधत बताया गया है। महराजगंज जनपद के अड्डा बाजार के समीप स्थित बनसिहा- कला में 88.8 एकड़ भूमि पर एक नगर, किले एवं स्तूप के अवशेष उपलब्ध हुए हैं। 1992 में डा. लाल चन्द्र सिंह के नेतृत्व में किये गये प्रारंभिक उत्खनन से यहां टीले के निचते स्तर से उत्तरी कृष्णवणीय मृदमाण्ड (एन.बी.पी.) पात्र- परम्परा के अवशेष उपलब्ध हुए हैं गोरखपुर विश्वविधालय के प्राचीन इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष डा. सी.डी.चटर्जी ने देवदह की पहचान बरसिहा कला से ही करने का आग्रह किया। महराजगंज में दिनांक 27-2-97 को आयोजित देवदह-रामग्राम महोत्सव गोष्ठी में डा. शिवाजी ने भी इसी स्थल को देवदह से समीकृत करने का प्रस्ताव रखा था। सिंहली गाथाओं में देवदह को लुम्बिनी समीप स्थित बताया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि देवदह नगर कपिलवस्तु एवं लुम्बिनी को मिलाने वाली रेखा में ही पूर्व की ओर स्थित रहा होगा। श्री विजय कुमार ने देवदह के जनपद के धैरहरा एंव त्रिलोकपुर में स्थित होने की संभावना व्यक्त की है। पालि-ग्रन्थों में देवदह के महाराज अंजन का विवरण प्राप्त होता है। जिनके दौहित्र गौतम बुद्ध थे। प्रो. दयानाथ त्रिपाठी की मान्यता है कि महाराज अंजन की गणभूमि ही कलांतर में विकृत होकर महाराजगंज एवं अंन्तत: महाराजगंज के रूप परिणित हुई। फारसी भाषा का गंज शब्द बाजार, अनाज की मंडी, भंडार अथवा खजाने के अर्थ में प्रयुक्त है जो महाराजा अंजन के खजाने अथवा प्रमुख विकय केन्द्र होने के कारण मुसिलम काल में गंज शब्द से जुड़ गया। जिसका अभिलेखीय प्रमाण भी उपलब्ध है। ज्ञातव्य हो कि शोडास के मथुरा पाषाण लेख में गंजवर नामक पदाधिकारी का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है। छठी शताब्दी ई0 में पूर्व में अन्य गणतंत्रों की भांति कोलिय गणतंत्र भी एक सुनिश्चित भोगौलिक इकाई के रूप में स्थित था। यहां का शासन कतिपय कुलीन नागरिकों के निर्णयानुसार संचालित होता था। तत्कालीन गणतंत्रों की शासन प्रणाली एवं प्रक्रिया से स्पष्टत: प्रमाणित होता है कि जनतंत्र बुद्ध अत्यन्त लोकप्रिय थे। इसका प्रमाण बौद्ध ग्रंथों में वर्णित शक्यो एवं कोलियों के बीच रोहिणी नदी के जल के बटवारें को लेकर उत्पन्न विवाद को सुलझाने में महात्मा बुद्ध की सक्रिय एवं प्रभावी भूमिका में दर्शनीय है। इस घटना से यह भी प्रमाणित हो जाता है कि इस क्षेत्र के निवासी अति प्राचीन काल से ही कृषि कर्म के प्रति जागरूक थे। कुशीनगर के बुद्ध के परिनिर्वाण के उपरांत उनके पवित्र अवशेष का एक भाग प्राप्त करने के उद्देश्य से जनपद के कोलियों का दूत भी कुशीनगर पहुंचा था। कोलियों ने भगवान बुद्ध क पवित्र अवशेषों के ऊपर रामग्राम में एक स्तूप निर्मित किया था, जिसका उल्लेख फाहियान एवं हवेनसांग ने अपने विवरणों में किया है। निरायवली-सूत्र नामक ग्रंथ से ज्ञात होता है कि जब कोशल नरेश अजातशत्रु ने वैशाली के लिचिछवियों पर आक्रमण किया था, उस समय लिचिछवि गणप्रमुख चेटक ने अजातशत्रु के विरूद्व युद्ध करने के लिए अट्ठारह गणराज्यों का आहवान किया था। इस संघ में कोलिय गणराज्य भी सम्मिलित था। छठी षताब्दी ई. पूर्व के उपरांत राजनीतिक एकीकरण की जो प्रक्रिया प्रारम्भ हुई उसकी चरम परिणति अशोक द्वारा कलिंग युद्ध के अनंतर शास्त्र का सदा के लिए तिलांजलि द्वारा हुआ। महराजगंज जनपद का यह संपूर्ण क्षेत्र नंदों एवं मौर्य सम्राटों के अधीन रहा। फाहियान एंव हवेनसांग ने सम्राट अशोक के रामग्राम आने एवं उसके द्वारा रामग्राम स्तूप की धातुओं को निकालने के प्रयास का उल्लेख किया है। अश्वघोष के द्वारा लिखित बुद्ध चरित (28/66) में वर्णित है कि समीप के कुण्ड में निवास करने वाले एवं स्तूप की रक्षा करने की नाग की प्रार्थना से द्रवित होकर उसने अपने संकल्प की परित्याग कर दिया था।
Source : महाराज गंज का इतिहास

Monday, June 1, 2020

हमारे प्राचीन राजा मान्धाता की कथा: भगवान श्री राम के पूर्वज

June 01, 2020 0
हमारे प्राचीन राजा मान्धाता की कथा: भगवान श्री राम के पूर्वज

हमारे प्राचीन राजा मान्धाता की कथा: कोली समाज की उत्पत्ति

हमारे प्राचीन राजा मान्धाता(Mandhata) की कथा, मोहनजो दारो के पुरातात्विक निष्कर्ष 5000-3000 ईसा पूर्व के हैं। वहां के पत्थर के शिलालेखों में उनके राज्यों में महान कोली राजाओं और प्रशासन की उनकी पंचायती पद्धति का वर्णन है। महान राजा मान्धाता के संदर्भ में कई बार और उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं, वीरता, और यज्ञ के कई प्रकाशनों में वर्णित हैं।


इक्ष्वाकु सूर्यवंश:

राजा मान्धाता के बारे मे अनुमान है कि वे लगभग दस हजार साल पहले जीवित थे। उसके बाद श्री राम, श्री कृष्ण और भगवान बुद्ध जैसी महान आत्माओं का जन्म हुआ। फिर भी राजा मान्धाता की उपलब्धियों की महानता ऐसी थी कि एक सांसारिक भाषाप्रकार इस दिन सार्वभौमिक उपयोग में आया, जब दूसरों से यह पूछने की तुलना की गई  की क्या वह मान्धाता(Mandhata) की तरह महान थे? ’मंधाता की तुलना सूर्यवंश में सबसे चमकीले तारे के रूप में की गई है और उनका जन्म हुआ था ब्रह्मा की 15 वीं पीढ़ी में। महान मनु के बाद 10 वीं पीढ़ी में  मान्धाता(Mandhata) हुये थे। मन्धाता के बाद श्री राम का जन्म 25 वीं पीढ़ी के रूप में कहा जाता है। इक्ष्वाकु सूर्यवंश कोली राजा का एक और महान राजा था और इसलिए मान्धाता(Mandhata) और श्री राम को  इक्ष्वाकु सूर्यवंश का कहा जाता था। यह राजवंश बाद में नौ प्रमुख उप समूहों में विभाजित हो गया, सभी अपनी जड़ों को क्षत्रिय जाति का दावा करते थे। वे हैं: मल्ल, जनक, विदेहि, कोलय, मोर्य, लिच्छवी, जनात्रि, वाजजी, और शाक्य। '


श्रीराम की पीढ़ी में  मान्धाता:

1. ब्रह्मा जी से मरीचि हुए,
2. मरीचि के पुत्र कश्यप हुए,
3.कश्यप के पुत्र विवस्वान हुए,
4. विवस्वान के वैवस्वत मनु हुए.वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था,
5. वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था, इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और                                                                    इस प्रकार इक्ष्वाकु कुलकी स्थापना की |
6. इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए,
7. कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था,
8. विकुक्षि के पुत्र बाण हुए,
9.  बाण के पुत्र अनरण्य हुए,
10. अनरण्य से पृथु हुए,
11. पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ,
12. त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए,
13. धुन्धुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था,
14. युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए,
15. मान्धाता से सुसन्धि का जन्म हुआ,
16. सुसन्धि के दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि एवं प्रसेनजित,
17. ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत हुए,
18. भरत के पुत्र असित हुए,
19. असित के पुत्र सगर हुए,
20. सगर के पुत्र का नाम असमंज था,
21. असमंज के पुत्र अंशुमान हुए,
22. अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए,
23. दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए, भागीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतारा था.भागीरथ के पुत्र ककुत्स्थ थे |
24. ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए, रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम रघुवंश हो गया, तब से श्री राम के कुल को रघु कुल भी कहा जाता है |
25. रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुए,
26. प्रवृद्ध के पुत्र शंखण थे,
27. शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए,
28. सुदर्शन के पुत्र का नाम अग्निवर्ण था,
29. अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग हुए,
30. शीघ्रग के पुत्र मरु हुए,
31. मरु के पुत्र प्रशुश्रुक थे,
32. प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष हुए,
33. अम्बरीष के पुत्र का नाम नहुष था,
34. नहुष के पुत्र ययाति हुए,
35. ययाति के पुत्र नाभाग हुए,
36. नाभाग के पुत्र का नाम अज था,
37. अज के पुत्र दशरथ हुए,
38. दशरथ के चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हुए |

इस प्रकार ब्रह्मा की उन्चालिसवी (39) पीढ़ी में श्रीराम का जन्म हुआ  मान्धाता की 25 वीं पीढ़ी थी|


मान्धाता के जन्म की बहुत रसप्रद कथा:

राजा युवनाशवर, मान्धाता(Mandhata) के पिता की सौ पत्नियां थीं लेकिन उनके लिए कोई पुरुष संतान पैदा नहीं हुई थी। उन्होंने कई ऋषियों से सलाह ली और आखिर में भार्गव ऋषि आए जो उनके लिए पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ करने को तैयार हो गए। यज्ञ के अंत में, अगली सुबह राजा को अपनी रानी के पास ले जाने के लिए मंत्र-आरोपित-जल का एक पात्र रखा गया। रात के समय, राजा प्यासा हो गया और आश्रम में पानी की तलाश में चला गया। उसने बर्तन देखा और इस गुणकारी पानी से अपनी प्यास बुझाई। नियत समय में, राजा के पेट को काटकर एक पुत्र का उद्धार किया गया। भगवान इंद्र ने इस अनोखी घटना के बारे में सुना और शिशु को देखने आए। यह सवाल करने के लिए कि बच्चे को कौन खिलाएगा और उसकी रक्षा करेगा, इंद्र ने अपना अंगूठा बच्चे के मुंह में डाल दिया और कहा कि 'मा थश्यती'। इस प्रकार बच्चे का नाम 'मंधाता' रखा गया और बाद में उसने भगवान इंद्र से युद्ध की कला सीखी और अपना अजेय धनुष प्राप्त कर लिया।


मान्धाता का पराक्रम:

राजा मान्धाता(Mandhata) ने अपनी बेहतर ताकत, ज्ञान और अच्छी तरह से सुसज्जित सेना के साथ विशाल क्षेत्रों और कई आसपास के राज्यों पर विजय प्राप्त की। वह पराजित राजाओं को पुनर्स्थापित करेगा। ऐसे राजा को वार्षिक कर का भुगतान करने के लिए सहमत किया जाएगा। अनुपालन और सुशासन सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक राज में एक राजदूत तैनात किया जाएगा। ऐसे राजा को भी मान्धाता(Mandhata) की सुरक्षा प्राप्त थी। इस वादे को पूरा करने के लिए उन्हें एक बार अपने ही देवता इंद्र से लड़ना पड़ा, जिन्होंने हारने पर मंधाता को एक राक्षस राजा लवकुशूर से लड़ने की चुनौती दी। जल्द ही इस दानव राजा के साथ लड़ाई के लिए एक अवसर पैदा हुआ।

हमेशा विजय रहनेवाला राजा मान्धाता(Mandhata) के लिए, यह मुठभेड़ उनके जीवन का एक विलक्षण अंत साबित हुई। राजा और उसकी सेना ने लवणासुर के राज्य में अधिकार किया, लेकिन कोई प्रतिरोध नहीं हुआ। शाम ढल रही थी। राजा मंधाता ने रात के लिए शिविर लगाने का फैसला किया, अगले दिन लवणासुर को पकड़ने का भरोसा दिया। लावनासुर के जासूस ने हालांकि रात में शिविर में घुसपैठ की और सो रहे राजा को मार डाला।


पुरातात्विक निष्कर्ष:

पुरातात्विक निष्कर्ष, जब एक साथ पाइक किया जाता है, तो मान्धाता(Mandhata) को इक्ष्वाकु - सूर्य वंश और उनके वंशज 'सूर्य वंश कोली किंग्स' के रूप में जाना जाता है। वे बहादुर, शानदार और न्यायप्रिय शासकों के रूप में जाने जाते थे। बौद्ध ग्रंथों में संदेह से परे कई संदर्भ हैं। मान्धाता(Mandhata) के वंशजों ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और हमारे प्राचीन वेदों, महाकाव्यों और अन्य अवशेषों ने युद्ध और राज्य प्रशासन की कला में उनके महत्वपूर्ण योगदान का उल्लेख किया। वे हमारी प्राचीन संस्कृत पुस्तकों में कुल्ल, कुली, कोली सर्प, कोलिक, कौल आदि के रूप में संदर्भित हैं।

 

 

भारत में कोली-कोरी सम्राट की सूची

June 01, 2020 0
भारत में कोली-कोरी सम्राट की सूची

ABCD

 

राजा का नामसाम्राज्यसाम्राज्य

श्रीमंत राजा यशवंत राव विक्रम शाह

(Srimant King Yaswant Rao Vikram Shah)

 

Jabhar

ठाकुर केसरी सिंहजी

Thakur Kesri Singh Ji

कटोसन

Katosan

ठाकुर जालिम सिंहजी

Thakur Jalim Singh Ji

अंबलियार

Ambliyaar

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ठाकुर पथेसिंह

Thakur Patheh Singh

घोडसर

Ghodasar

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ठाकुर सूरज सिंह

Thakur Suraj Singh

 सत्यमपा

Sathampa

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ठाकुर मोहन सिंह

Thakur Mohan Singh

खरस

Kharas

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ठाकुर शिव सिंह

Thakur Shiv Singh

धामा

Dhama

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ठाकुर मान सिंह

Thakur Maan Singh

एलोल

Elol

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कोली राज्यों का विस्तार : बुंदेलखंड

June 01, 2020 0
कोली राज्यों का विस्तार : बुंदेलखंड

 

बुंदेलखंड (16 वीं शताब्दी तक (चंदेलों के शासनकाल में) को जाजक भक्ति या जेजाका भक्ति के रूप में जाना जाता है) मध्य भारत का एक भौगोलिक क्षेत्र है। यह क्षेत्र अब उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश राज्यों के बीच बंटा हुआ है, जिसका बड़ा हिस्सा उत्तर में स्थित है।

प्रमुख शहर झांसी, दतिया, ललितपुर, सागर, दमोह, ओराई, पन्ना, महोबा, बांदा नरसिंहपुर और छतरपुर हैं। हालांकि, ग्वालियर, जबलपुर और यहां तक कि भोपाल शहर भी बुंदेलखंड के सांस्कृतिक प्रभाव के अधीन हैं, विशेष रूप से स्थानीय रूप से। हालांकि, बुंदेलखंड का सबसे प्रसिद्ध स्थान खजुराहो है, जिसमें 10 वीं शताब्दी के कई मंदिर हैं, जो उत्तम जीवन और कामुकता के लिए समर्पित हैं। पन्ना की खदानें शानदार हीरों के लिए प्रसिद्ध रही हैं; और आखिरी से खोदा गया एक बहुत बड़ा कालिंजर के किले में रखा गया था।

 

कोली-कोरी समाज की उपजातियाँ-Subcastes of Koli-Kori Samaj

June 01, 2020 0
कोली-कोरी समाज की उपजातियाँ-Subcastes of Koli-Kori Samaj
  • शाक्य - Shakya
  • महावर - Mahawar
  • मेहरा - Mehra
  • तांती - Taanti
  • पटवा पान -Patwa Paan
  • कश्यप - Kashyap
  • कुथार - Kuthar
  • ताडपाड़ा - Tadpada
  • लेहगीर - Lehgir
  • धीमान - Dheeman
  • बनोगा - Banogha
  • एयरवर - Airwaar
  • मुदिराज - Mudiraaj
  • दाबी - Daabhi
  • दामि चौहान - Daami Chauhan

भारत के विभिन्न राज्यों में कोली/कोरी(Koli in various states of India)

June 01, 2020 0
भारत के विभिन्न राज्यों में कोली/कोरी(Koli in various states of India)

उत्तरप्रदेश:

उत्तरप्रदेश में सोसाइटी को बारह एंडोगामस उपसमूहों में बांटा गया है, जैसे कि अहरवार, बनबटा, धीमान, हल्दीहा, जैसवार, कबीर पंथी, कैथिया, कमलवंशी, कमरिया, महाुरे, साक्यार और शंखवार और ये उपसमूह एक दूसरे के संबंध में समान स्थिति के हैं। इनमें से प्रत्येक उपसमूह को एक्जोटामस गोत्र में विभाजित किया गया है जैसे कि चाचोंडिया, काशमोर, खिरवार, कोठारिया, आदि।

मध्यप्रदेश:

मध्यप्रदेश में, कोरी इंदौर, खरगोन, खंडवा, धार और उज्जन जिलों में वितरित किए जाते हैं। महाराष्ट्र में, कोरी मानते हैं कि वे महर्षि कश्यप के वंशज हैं। एक अन्य संस्करण के अनुसार, कोरी के पूर्वज एक ब्राह्मण लड़की के साथ कबीर के मिलन से पैदा हुए थे। ऐसा माना जाता है कि वे मध्य प्रदेश के रीवा जिले से अपने वर्तमान निवास स्थान पर चले गए थे। भंडारा, नागपुर और अमरावत जिले में समाज का वितरण।

उड़ीसा :

उड़ीसा में, कोरी कोली, कोली और कुली मल्हार भी कहा जाता है और पूरे राज्य में वितरित किया जाता है लेकिन मयूरभंज जिले में उनकी प्रमुख एकाग्रता है। इन्हें अलग-अलग गैर-पदानुक्रमित गोत्र में विभाजित किया गया है, जैसे बाघा, चौला, बेला, सदा, गंगालवा, नागेश्वर, आदि पात्रा, कौर और बेहरा उनके उपनाम हैं।

राजस्थान:

राजस्थान में, कोली एक पारंपरिक बुनाई समुदाय है जो अब अपने जीवन यापन के लिए कृषि और अन्य नौकरियों में लगे हुए हैं। उन्हें राजस्थान के विभिन्न हिस्सों में कोरी, कोरिया और बंकर के रूप में भी जाना जाता है और कोरिया कोरी की ध्वन्यात्मक भिन्नता है। वे सवाईमाधोपुर, जयपुर, अजमेर, कोटा, बूंदी, भरतपुर, करोली, दौसा, टोंक और अलवर जिलों में केंद्रित हैं। शहरी क्षेत्रों से काफी संख्या में कोली, कोरी को लौटाया जाता है। राजस्थान में कोली को अलग-अलग उपसमूहों में विभाजित किया जाता है जैसे कि महावर, सकवार, कबीरपंथी, राठड़ा, इत्यादि, हालांकि, महावर, सकवार और अन्य लोग अंतर-विवाह कर सकते हैं। इन उपसमूहों को आगे चलकर कथनलिया, नाहवान, कजोट्य, राजोरी, कटारिया, मोरवाल, गोदरिया, देवतवाल, नेपालपुरिया, भारवाल आदि जैसे कई अतिरंजित कुलों में विभाजित किया गया है।

दिल्ली:

दिल्ली में, कोली राजस्थान और उत्तर प्रदेश के प्रवासी हैं। उन्हें किल्ली, बंकर, तंतूबाई, कोरी, कापरे या कापरडिया और महार किली के नाम से भी जाना जाता है। वे गौशाला, नंदनागरी, दक्षिणपुर, सावन पार्क, कोटला, मुबारकपुर, मदनगिरी, आश्रम, पहाड़गंज और सदर में केंद्रित हैं।

समाज की भाषा और बोलियों:

समाज भारत-आर्य भाषा, हिंदी, मालवी, निमाड़ी स्थानीय भाषाओं की विभिन्न बोलियों में बोलता है और देवनागरी लिपि का उपयोग करता है। अंतर-समूह संचार के लिए भी, वे हिंदी और स्थानीय भाषाओं का उपयोग करते हैं। कोली ने अपने बच्चों को स्कूलों और कॉलेजों में भेजना शुरू कर दिया है और शिक्षा के क्षेत्र में अच्छी प्रगति की है।

क्षत्रिय नागवंशी कोलिय कुल(Kshatriya Nagvanshi Koli Kul)

June 01, 2020 0
क्षत्रिय नागवंशी कोलिय कुल(Kshatriya Nagvanshi Koli Kul)

क्षत्रिय नागवंशी कोलिय कुल(Kshatriya Nagvanshi Koli Kul):

क्षत्रिय नागवंशी कोलिय कुल एक विशुद्ध क्षत्रिय कुल है।अगर आप भगवान गौतम बुद्ध को जानते हैं तो आप कोलिय को भी भली भांति पहचानते हैं। गौतम बुद्ध की माताजी नागवंशी क्षत्रिय कोलिय राजकुमारी थी। सिंह शब्द का उच्चारण सर्वप्रथम "शाक्य सिंह" सिद्धार्थ गौतम के लिए किया गया। सूर्यवंशी क्षत्रियो की शाखा नागवंशी क्षत्रिय है और नागवंशी क्षत्रियो की शाखा कोलिय कुल है।

कोलिय क्षत्रियो को  नागवंशी क्षत्रिय भी कह सकते हैं, ऐसा माना जाता है कि सूर्य की तीसरी पत्नी क्रोधवशा से नागवंश की उत्पत्ति हुई। और इससे आगे  नागवंशी क्षत्रिय राजा राम ओर सूर्यवँशी शाक्य राजकुमारी पिया से काशी में  क्षत्रिय नागवंशी कोलिय कुल आगे बढ़ा।  काशी महादेव की भूमि है और काशी पर नागवंशी क्षत्रियों का ही राज्य रहा है। जैन धर्म के तेइसवें तीर्थकर भगवान पार्श्वनाथ ने काशी के महाप्रतापी राजा अश्वसेन के पुत्ररूप मैं जन्म लिया था जो एक नागवंशी कोलिय क्षत्रिय थे।

 
 

 

शक्तिशाली क्षत्रिय कोलिय राजा राजा चोल प्रथम:चोल साम्राज्य

June 01, 2020 0
शक्तिशाली क्षत्रिय कोलिय राजा राजा चोल प्रथम:चोल साम्राज्य
 
वंश                              : चोल वंश
शासन काल                 : 985 ईसवी से 1014 ईसवी तक
पदवी                          : राजकेसरी
राजधानी                     : तंजौर
पूर्वाधिकारी                 : उत्तम चोल
उत्तराधिकारी              : राजेन्द्र चोल प्रथम
पिता                          : सुन्दर चोल
रानियाँ                       : लोकमहादेवी, चोलमहादेवी, , पँचवान्महादेवी, अभिमानावल्ली, पृथ्वीमहादेवी
बच्चे                          : राजेंद्र चोल प्रथम, कुंदवाई मदेवादिगल
बचपन का नाम          : अरुलमोजहीवर्मन
 
 
चोल शब्द  से कोलिय शब्द   का संबंध:
'चोल' शब्द की व्युत्पत्ति विभिन्न प्रकार से की जाती रही है। चोल शब्द को संस्कृत "काल" एवं "कोल" से संबंध है। चोल शब्द को संस्कृत "चोर" तथा तमिल "चोलम्" से भी संबंध है।
 
चोल साम्राज्य के बारे मे जिसने जीता समुद्व फतह की लंका                                                                     
 
दक्षिण भारत में शक्तिशाली तमिल चोल साम्राज्य का इतिहास 9वीं शताब्दी से लेकर 13वीं शताब्दी तक मिलता है। चोल साम्राज्य के 20 राजाओं ने दक्षिण एशिया के एक बड़े हिस्से पर लगभग 400 साल तक शासन किया। मेगस्थनीज की इंडिका और अशोक के अभिलेख में भी चोलों का उल्लेख किया गया है।
 
कहते हैं कि चोल शासकों ने अपनी विजय यात्रा में आज के केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, बंगाल और दक्षिण एशिया में पूरा हिंद महासागर व श्रीलंका और दक्षिण पूर्व एशिया में अंडमान-निकोबार, मलेशिया, थाईलैंड एवं इंडोनेशिया तक को फतह किया था।
 
विजयालय चोल ने रखी थी नींव:
कांची के पल्लवों के सामंत विजयालय चोल ने सन 850 ईस्वी में तंजौर पर कब्जा कर चोल साम्राज्य की नींव रखी। नौवीं शताब्दी के अंत तक चोलों ने पूरे पल्लव साम्राज्य को हराकर पूरी तरह से तमिल राज्य पर अपना कब्जा कर लिया.इसी कड़ी में आगे 985 ईस्वी में शक्तिशाली चोल राजा अरुमोलीवर्मन ने अपने आपको राजराजा प्रथम घोषित किया, जो आगे चलकर चोल शक्ति को चरमोत्कर्ष पर ले गया।
 
चोल वंश के पहले प्रतापी राजा राजराजा ने अपने 30 के शासन में चोल साम्राज्य को काफी विस्तृत कर लिया था. राजाराज ने पांड्या और केरल राज्यों के राजाओं को हराकर अपनी विजय की शुरुआत की।  उन्होंने पश्चिमी तट, दक्षिणी तट और अपनी शक्तिशाली नौसेना की सहायता से श्रीलंका के उत्तरी राज्य सिंहल द्वीप पर कब्जा किया ।
 
‘राजराज प्रथम’ की रक्त नीति:
शायद इसलिए ही कहा जाता है कि राजराजा के शासन काल में चोल दक्षिण भारत का सबसे शक्तिशाली राज्य बना। वह पांड्य, केरल व श्रीलंका के राजाओं का मजबूत संघ नष्ट कर अपने अंत समय में मालदीव और मैसूर के कई हिस्सों पर कब्जा करने में सफल रहा। राजराजा प्रथम ने लौह और रक्त की नीति का पालन करते हुए श्रीलंका के शासक महिंद पंचम को पराजित कर मामुण्‍डी चोल मण्डलम नामक नए प्रांत को स्थापित किया।  साथ ही उसकी राजधानी जनजाथमंगलम बनाई। इसके अलावा 1012 ईस्वी में राजराजा ने कंबोडिया के सबसे बड़े हिंदू मंदिर अंकोरवाट को बनवाने वाले राजा सूर्य वर्मन के साथ कूटनीतिक संबंध बनाए। राजराजा ने 1010 ईस्वी में थंजावुर में भगवान शिव को समर्पित बृहदेश्वर या राजराजेश्वर मंदिर का निर्माण कराया। यह दक्षिण भारतीय शैली में वास्तुकला का उल्लेखनीय नमूना माना जाता है।
 
‘राजेंद्र प्रथम’ ने किया विस्तार:
चोलों के विस्तार की बात आती है, तो राजेंद्र प्रथम का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। 1012 ईस्वी के आसपास चोल साम्राज्य के उत्तराधिकारी बनने के बाद उन्होंने अपने पिता राजराजा की विस्तारवादी विजय नीतियों को आगे बढ़ाया। पिता से भी आगे बढ़कर राजेंद्र प्रथम ने दक्षिण भारत में अपने वंश की महानता का डंका बजाया।
राजेंद्र प्रथम ने चोल साम्राज्य की सीमा का विस्तार अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, श्रीलंका, मालदीव, मलेशिया, दक्षिणी थाईलैंड और इंडोनेशिया तक कर लिया।
 
प्राचीन समय में व्यापार मुख्य रूप से समुद्री मार्ग से होता था।  मालों से लदे जहाज हिंद महासागर होकर चीन-जापान व दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों तक माल ले जाया करते थे। अपने व्यापार को बढ़ाने और समुद्री सुरक्षा के लिए राजेंद्र प्रथम समुद्र जीतने निकल पड़ा। इसने अपने नौसेना बेड़े को मजबूत किया और लड़ाकू जहाजों व छोटे गश्ती जहाजों की टोली बनाकर राज्यों की समुद्री सीमाओं पर तैनात कर दिया।  देखते ही देखते समूचे हिंद महासागर और मालदीव, बंगाल की खाड़ी और मलक्का तक पूरे समुद्र को चोल राजाओं ने जीत लिया और उस पर अपना एकछत्र राज कायम किया।
 
समुद्री व्यापार मार्ग पर कब्जा:
उसने अपने व्यापार को इस रास्ते चीन-जापान और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों तक पहुंचाने के साथ-साथ वहां से गुजरने वाले अन्य जहाजों को भी सुरक्षित किया और उन्हें सुरक्षा प्रदान की। हालांकि, दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से चाेलाें के अच्छे संबंध थे, फिर भी वहां के सैनिक हर राेज चोलों की नावों को लूट लेते थे। इन्हें सबक सिखाने के लिए राजेंद्र प्रथम ने सन् 1025 ईस्वी में गंगा सागर पार कर जावा और सुमात्रा द्वीप पर अधिकार किया. वहीं चोल नौसेना ने इसके बाद मलेशिया पर आक्रमण कर उसके प्रमुख बंदरगाह कंडारम पर अपना कब्जा कर लिया। इन सब के बाद दक्षिण का समुद्री व्यापार मार्ग पूरी तरह से चोलों के कब्जे में था।
 
    उनके बाद उनका बेटा राजाधिराज प्रथम 1044 ईस्वी में गद्दी पर बैठा।  उसने सीलोन में शत्रुतापूर्ण ताकतों को उखाड़ फेंका और इस क्षेत्र को अपने अधीन कर लिया। कोप्पम में चालुक्य राजा सोमेश्वर द्वितीय के साथ लड़ाई में इनकी मौत हो गई। इस कारण आगे उनके भाई राजेंद्र द्वितीय ने राजगद्दी संभाली।
 
    चोल-वंश के कालखंड में, चोल-नौसेना को सबसे शक्तिशाली नौ-सेनाओं में से एक माना जाता था। कहते हैं कि नौसेना के दम पर ही अपने चोल अपने सम्राज्य का विस्तार कर पाए।  सही मायने में उनकी नौसेना ही उनकी असल ताकत थी।  खोज-यात्राओं के कई उदाहरण संगम-साहित्य में आज भी उपलब्ध हैं।  दरअसल विश्व में ज्यादातर नौ-सेनाओं ने बहुत देर के बाद युद्ध-पोतों पर महिलाओं को जाने के लिए मंजूरी दी थी।
     खास बात तो यह है कि चोल-नौसेना में बहुत बड़ी संख्या में महिलाओं काम करती थी।  वहां उनकी भूमिका अहम होती थी। जरूरत पड़ने पर वह युद्ध में भी शामिल होती।  इसके साथ-साथ चोल-शासकों के पास युद्ध पोतों के निर्माण के बारे में एक समृद्ध ज्ञान था, जिसका प्रयोग करते हुए वह दुश्मन को घुटने टेकने पर मजबूर करते रहे। चोल-नौसेना के महत्व को इसी से समझा जा सकता है कि सदियों बाद भी उसकी प्रासंगिकता बनी हुई है. यहां तक कि नवंबर 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यक्रम मन की बात की बात में इसका गुणगान किया था.
 
चोल साम्राज्य का पतन:
मध्ययुग के कई तमिल कवियों ने भी अपनी कविताओं में चोल राजाओं की विजयों का वर्णन किया है। चोलों के समय महमूद गजनवी जैसे कई आक्रांताओं ने भारत पर लूट के मकसद से आक्रमण कर दिया था।  ऐसे में लुटते उत्तर भारत को देखते हुए राजेंद्र चोल ने सैन्य विस्तार पर ज्यादा बल दिया और अपने सम्राज्य को मजबूत किया।
 
हालांकि, उस समय उसके सामने चुनौतियां कम न थीं वहां राज्यों पर कब्जा करने और वर्चस्व की लड़ाई जारी थी, फिर भी उसने अपनी सेना को मजबूत किया और समुद्र से सुरक्षा के लिए एक नौसेनिक बेड़े की स्थापना की। अपने विशाल समुद्री बेड़े से चोल साम्राज्य ने कई दक्षिण एशियाई शासकों-प्रायद्वीपों के विरूद्ध लड़ाई लड़ी और उनमें विजयश्री हासिल की। बारहवीं सदी तक चोल साम्राज्य में सबकुछ ठीक-ठाक रहा और वह निरंतर प्रगति के पथ पर बढ़ते रहे, किन्तु आगे वह धीरे-धीरे कमजोर होने लगे। उन्हें चालुक्यों व होयसलों की शत्रुता का सामना करना पड़ा।
 
इस दौर को वह संभाल न पाए और 1267 ईस्वी आते-आते उनका केंद्रीय शासन पूरी तरह से लचर हो गया।  इसका फायदा उठाते हुए 1310 ईस्वी के आसपास अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफूर ने उन पर आक्रमण कर, उनका पतन कर दिया।
 
 

The mighty Kshatriya king Raja Chola I

Dynasty                         : Chola Dynasty
Government Period   : 985 AD to 1014 AD
Title                              : Rajakesari
Capital                         : Tanjore
Predecessor                : Uttam Chola
Successor                    : Rajendra Chola I
Father                         : Sundar Chola
Queens                       : Lokmahadevi, Cholmahadevi, Trailokmahadevi, Panchwanmahadevi, Abhimanavalli, Eadamadeviar, Prithvimahadevi
Children                    : Rajendra Chola I, Kundavai Madevadigal
Childhood Name     : Arulmojahivarman
Death                         : 1014 AD

क्षत्रिय-राजपूत गौतम वँश : जिसमे राजा सिद्धार्थ का जन्म हुआ

June 01, 2020 0
क्षत्रिय-राजपूत गौतम वँश : जिसमे राजा सिद्धार्थ का जन्म हुआ

क्षत्रिय-राजपूत गौतम वँश  जिसमे  राजा सिद्धार्थ का जन्म हुआ था और बाद मे वो ही "महात्मा बुद्ध" बने थे।

  • गौतम वँश।
    • वंश           :-  सूर्यवंश,इक्ष्वाकु ,शाक्य
    • गोत्र           :-  गौतम
    • प्रचर पाँच  :-  गौतम , आग्डिरस , अप्सार,बार्हस्पत्य, ध्रुव
    • कुलदेवी    :- चामुण्ङा माता,बन्दी माता,दुर्गा माता
    • देवता        :-  महादेव योगेश्वर,श्रीरामचन्द्र जी
    • वेद            :- यजुर्वेद
    • शाखा        :- वाजसनेयी
    • प्रसिद्ध महापुरुष  :-  गौतम बुद्ध
    • सुत्र           :- पारस्करगृहासूत्र
    • गौतम वंश का महामंत्र:-

रेणुका: सूकरह काशी काल बटेश्वर:।

कालिंजर महाकाय अश्वबलांगनव मुक्तद:॥

    • प्राचीन राज्य    :-  कपिलवस्तु, अर्गल, मेहनगर, कोरांव,बारां(उन्नाव),लशकरपुर ओईया(बदायूं)
    • निवास            :-  अवध,रुहेलखण्ड,पूर्वांचल,बिहार,मध्य प्रदेश
    • शाखाएं           :-  कंडवार, गौनिहां, रावत,अंटैया,गौतमिया  आदि
    • प्राचीन शाखाएं :-  मोरी(मौर्य),परमार(सम्भवत)
                 1891 की जनगणना में यूपी में कुल 51970 गौतम राजपूत थे अब करीब दो से ढाई लाख होंगे,इसमें बिहार और मध्य प्रदेश के गौतम राजपूतो की संख्या भी जोड़ ले तो करीब 350000 गौतम राजपूतो की संख्या देश भर में होगी।
 
  • गौतम बुद्ध का जन्म भी इसी वंश में हुआ था।
वंश भास्कर के अनुसार---भगवान राम के किसी वंशज ने प्राचीन काल मे अपना राज्य नेपाल मे स्थापित किया ।
इसी वंश मे महाराणा शाक्य सिंह हुए जिनके नाम से यह शाक्य वंश कहा जाने लगा।  इसकी राजधानी कपिलवस्तु ( गोरखपुर ) थी। इसी वंश में आगे चलकर शुध्दोधन हुये जिनकी बडी रानी से सिद्धार्थ उत्पन्न हुये जो " गौतम " नाम से सुविख्यात हुये । जो संसार से विरक्त होकर प्रभु भक्ति में लीन हो गये । संसार से विरक्त होने से पहले इनकी रानी यशोधरा को पुत्र (राहुल ) उत्पन्न हो चुका था। इन्हीं गौतम बुद्ध  के वंशज  " गौतम " राजपूत कहलाते हैं । इस वंश में राव, रावत, राणा, राजा  आदि पदवी प्राप्त घराने हैं ।
 
  • गौतम सूर्यंवंशी राजपूत हैं ये अयोधया के सूर्यवंश से अलग हुई शाखा है इन्हें पहले शाक्य वंश भी कहा जाता है।
             गौतम ऋषि द्वारा दीक्षित होने के कारण इनका ऋषि गोत्र गौतम हुआ जिसके बाद ये गौतम क्षत्रिय कहलाए जाने लगे।
अश्वघोष के अनुसार गौतम गोत्री कपिल नामक तपस्वी मुनि अपने माहात्म्य के कारण दीर्घतपस के समान और अपनी बुद्धि के कारण काव्य (शुक्र) तथा अंगिरस के समान था| उसका आश्रम हिमालय के पार्श्व में था| कई इक्ष्वाकु-वंशी राजपुत्र मातृद्वेष के कारण और अपने पिता के सत्य की रक्षा के निमित्त राजलक्ष्मी का परित्याग कर उस आश्रम में जा रहे| कपिल उनका उपाध्याय (गुरु) हुआ, जिससे वे राजकुमार, जो पहले कौत्स-गोत्री थे, अब अपने गुरु के गोत्र के अनुसार गौतम-गोत्री कहलाये| एक ही पिता के पुत्र भिन्न-भिन्न गुरुओं के कारण भिन्न भिन्न गोत्र के हो जाते है, जैसे कि राम (बलराम) का गोत्र "गाग्र्य" और वासुभद्र (कृष्ण) का "गौतम" हुआ| जिस आश्रम में उन राजपुत्रों ने निवास किया, वह "शाक" नामक वृक्षों से आच्छादित होने के कारण वे इक्ष्वाकुवंशी "शाक्य" नाम से प्रसिद्ध हुये| गौतम गोत्री कपिल ने अपने वंश की प्रथा के अनुसार उन राजपुत्रों के संस्कार किये और उक्त मुनि तथा उन क्षत्रिय-पुंगव राजपुत्रों के कारण उस आश्रम ने एक साथ "ब्रह्मक्षत्र" की शोभा धारण की
  • अर्गल राज्य की स्थापना।
शाक्य राज्य पर कोशल नरेश विभग्ग द्वारा आक्रमण कर इसे नष्ट कर दिया गया था जिसके बाद बचे हुए शाक्य गौतम क्षत्रियों द्वारा अमृतोदन के पुत्र पाण्डु के नेतृत्व में अर्गल राज्य की स्थापना की गयी।अर्गल आज के पूर्वांचल के फतेहपुर जिले में स्थित है।
प्रसिद्ध गौतम राजा अंगददेव ने अपने नाम का रिन्द नदी के किनारे "अर्गल" नाम की आबादी को आबाद करवाया और गौतम के खानदान की राजधानी स्थापित किया राजा अंगददेव की लडकी अंगारमती राजा कर्णदेव को ब्याही थी। राजा अंगददेव ने अर्गल से ३मील दक्षिण की तरफ एक किला बनवाया और इस किले का नाम "सीकरी कोट" यह किला गए में ध्वंसावशेष के रूप में आज भी विद्यमान है।
    1. राजा अंगददेव
    2. बलिभद्रदेव
    3. राजा श्रीमानदेव
    4. राजा ध्वजमान देव
    5. राजा शिवमान देव ने अर्गल से १मील दक्षिण रिन्द नदी के किनारे अर्गलेश्वर महादेव का मन्दिर बनवाया यहाँ आज भी शिवव्रत का मेला लगता है।अर्गल राजा कलिंग देव ने रिन्द नदी के किनारे कोडे (कोरा) का किला बनवाया।
  • 13वीं शताब्दी में अर्गल राज्य।
13वीं शताब्दी में भरो द्वारा अर्गल का हिस्सा दबा लिया था।उस समय अर्गल राज्य में अवध क्षेत्र के कन्नौज के रायबरेली फतेहपुर बांदा के कुछ क्षेत्र आते थे।
1320 के पास अर्गल के गौतम राजा नचिकेत सिंह व बैस ठाकुर अभय सिंह व निर्भय सिंह का जिक्र आता है। उस समय बैसवारा में सम्राट हर्षवर्धन के वंशज बैस ठाकुरों का उदय हो रहा था। उनके नाम पर ही इस क्षेत्र को बैसवारा क्षेत्र कहा गया। एक युद्ध में नचिकेत सिंह और उनकी पत्नी को गंगा स्नान के समय विरोधी मुस्लिम सेना ने घेर लिया तो निर्भय व अभय सिंह ने उन्हें बचाया था। इसमें निर्भय सिंह को वीर गति प्राप्त हुई थी। राजा ने अभय सिंह की बहादुरी से खुश होकर उन्हें अपनी पुत्री ब्याह दी और दहेज में उसे डौडिया खेड़ा का क्षेत्र सहित रायबरेली के 24 परगना (उस समय यह रायबरेली में आता था) और
फतेहपुर का आशा खेड़ा का राजा बनाया था। 1323 ईसवी में अभय सिंह बैस यहां के राजा हुए थे। यह पूरा क्षेत्र भरों से खाली कराने में अभय सिंह की दो पीढिया लगीं। इसके बाद आगे की पीढ़ी में मर्दन सिंह का जिक्र आता है।
  • मुगलो के अधिपत्य में अर्गल राज्य और आजमगढ़ राज्य की नीव।
अर्गल के गौतम राजा द्वारा चौसा के युद्ध में हुमायूँ को हराया गया जिससे शेरशाह सूरी को मुगलो को अपदस्थ कर भारत का सम्राट बनने में सहायता मिली।
जब मुगलों का भारत में दुबारा अधिपत्य हुआ तो उन्होंने बदले की भावना से अर्गल राज्य पर हमला किया और यह राज्य नष्ट हो गया।
फिर भी बस्ती गोरखपुर क्षेत्र में गौतम राजपूतो की प्रभुसत्ता बनी रही और ब्रिटिश काल तक गौतम राजपूतो के एक जमीदार परिवार शिवराम सिंह "लाला" को अर्गल नरेश की उपाधि बनी रही।
अर्गल के गौतम राजपूतो की एक शाखा पूर्वांचल गयी वहां मेहनगर के राजा विक्रमजीत गौतम ने किसी मुस्लिम स्त्री से विवाह कर लिया जिससे उन्हें राजपूत समाज से बाहर कर दिया गया। विक्रमजीत की मुस्लिम पत्नी के पुत्र ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया जिसका नाम आजम खान रखा गया।
इसी आजम खान ने आजमगढ़ राज्य की नीव रखी।
इस क्षेत्र के गौतम राजपूतों ने ओरंगजेब का भी मुकाबला किया था।
उत्तराधिकार संघर्ष में शाह शुजा भागकर फतेहपुर आया था जिसे गौतम राजपूतो ने शरण दी थी।जिसके बाद ओरंगजेब की 90000 सेना ने हमला किया जिसका 2 हजार गौतम राजपूतो द्वारा वीरता से मुकाबला किया गया।इसमें हिन्दू राजपूतो के साथ मुस्लिम गौतम ठाकुरों ने भी कन्धे से कन्धा मिलाकर जंग लड़ी।बाद में यहाँ के गौतम राजपूतो ने अंग्रेजो का भी जमकर मुकाबला किया और बगावत के कारण एक इमली के पेड़ पर 52 गौतम राजपूतो को अंग्रेजो द्वारा फांसी की सजा दी गयी।
  • अंग्रेज सरकार और  1857 के स्वतन्त्रता।
बस्ती जिले में नगर के गौतम राजा प्रताप नारायण सिंह ने 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम में अंग्रेजो के विरुद्ध क्रांति में बढ़ चढ़कर भाग लिया तथा अंग्रेजो को कई बार मात दी।लेकिन उनके कुछ दुष्ट सहयोगियों द्वारा विश्वासघात करने के कारण वो पकड़े गए तथा उन्हें अंग्रेजो द्वारा मृत्युदण्ड की सजा दी गयी।
  • आज के समय में  गौतम राजपूत की बस्ती।
             ◘ आज गौतम राजपूत गाजीपुर, फतेहपुर , मुरादाबाद , बदायुं, कानपुर , बलिया , आजमगढ़ , फैजाबाद , बांदा, प्रतापगढ, फर्रूखाबाद, शाहाबाद, गोरखपुर , बनारस , बहराइच, जिले(उत्तर प्रदेश )
            ◘ आरा, छपरा, दरभंगा(बिहार )
            ◘ चन्द्रपुरा, नारायण गढ( मंदसौर), रायपुर (मध्यप्रदेश ) आदि जिलों में बासे हैं ।
            ◘ "कण्ङवार" - दूधेला, पहाड़ी चक जिला छपरा बिहार में बहुसंख्या में बसे हैं ।
            ◘ चन्द्रपुरा, नारायण गढ( मंदसौर) में उत्तर प्रदेश के फतेहपुर से आकर गौतम राजपूत बसे हैं ।
            ◘ कुछ गौतम राजपूत पंजाब के पटियाला और हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर हमीरपुर कांगड़ा चम्बा में भी मिलते हैं
  • गौतम क्षत्रिय की खापें।
  1. गौतमिया गौतम    :- उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ और गोरखपुर जिलों में हैं।
  2. गोनिहा गौतम       :- बलिया,शाहबाद (बिहार) आदि जिलों में हैं।
  3. कण्डवार गौतम    :- कण्डावेनघाट  के पास रहने वाले गौतम क्षत्रिय कण्डवार गौतम कहे जाने लगे। ये बिहार के छपरा आदि जिलों में हैं।
  4. अण्टैया गौतम      :-  इन्होंने अपनी जागीर अंटसंट (व्यर्थ) में खो दी।इसीलिए अण्टैया गौतम कहलाते हैं।ये सरयू नदी के किनारे चकिया, श्रीनगर,जमालपुर,नारायणगढ़ आदि गांवों में बताये गए हैं।
  5. मौर्य गौतम          :- इस वंश के क्षत्रिय उत्तर प्रदेश के मथुरा,फतेहपुर सीकरी,मध्य प्रदेश के उज्जैन,इन्दौर,तथा निमाड़ बिहार के आरा जिलों में पाए जाते हैं।
  6. रावत क्षत्रिय        :- गौत्र - भारद्वाज। प्रवर - तीन - भारद्वाज, वृहस्पति, अंगीरस। वेद -यजुर्वेद। देवी -चण्डी। गौतम वंश की उपशाखा है। इन क्षत्रियों का निवास उन्नाव तथा फ़तेहपुर जिलों में हैं।
 

क्षत्रिय कोली राजपूत: महाभारत के युग के उपरान्त

June 01, 2020 0
क्षत्रिय कोली राजपूत: महाभारत के युग के उपरान्त
  • महाभारत  युग के बाद क्रांतिकारी परिवर्तन।
महाभारत के युग के उपरान्त इस सम्पूर्ण क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ। कोशल राज्य के अधीन अनेक छोटे-छोटे गणतंत्रात्मक राज्य असितत्व में आये, जिसमें कपिलवस्तु के क्षत्रिय शाक्यों और रामग्राम के क्षत्रिय कोलियों का राज्य वर्तमान महराजगंज जनपद की सीमाओं में भी विस्तृत था। क्षत्रिय शाक्य एवं क्षत्रिय कोलिय गणराज्य की राजधानी रामग्राम की पहचान की समस्या अब भी उलझी हुई है। डा. राम बली पांडेय ने रामग्राम को गोरखपुर के समीप स्थित रामगढ़ ताल से समीकृत करने का प्रयास किया है किन्तु आधुनिक शोधों ने इस समस्या को नि:सार बना दिया है। क्षत्रिय कोलिय का सम्बंध देवदह नामक नगर से भी था। बौद्धगंथों में भगवान गौतम बुद्ध की माता महामाया, मौसी महाप्रजापति गौतमी एवं पत्नी भद्रा कात्यायनी (यशोधरा) को देवदह नगर से ही सम्बनिधत बताया गया है। महराजगंज जनपद के अड्डा बाजार के समीप स्थित बनसिहा- कला में 88.8 एकड़ भूमि पर एक नगर, किले एवं स्तूप के अवशेष उपलब्ध हुए हैं। 1992 में डा. लाल चन्द्र सिंह के नेतृत्व में किये गये प्रारंभिक उत्खनन से यहां टीले के निचते स्तर से उत्तरी कृष्णवणीय मृदमाण्ड (एन.बी.पी.) पात्र- परम्परा के अवशेष उपलब्ध हुए हैं गोरखपुर विश्वविधालय के प्राचीन इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष डा. सी.डी.चटर्जी ने देवदह की पहचान बरसिहा कला से ही करने का आग्रह किया। महराजगंज में दिनांक 27-2-97 को आयोजित देवदह-रामग्राम महोत्सव गोष्ठी में डा. शिवाजी ने भी इसी स्थल को देवदह से समीकृत करने का प्रस्ताव रखा था। सिंहली गाथाओं में देवदह को लुम्बिनी समीप स्थित बताया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि देवदह नगर कपिलवस्तु एवं लुम्बिनी को मिलाने वाली रेखा में ही पूर्व की ओर स्थित रहा होगा। श्री विजय कुमार ने देवदह के जनपद के धैरहरा एंव त्रिलोकपुर में स्थित होने की संभावना व्यक्त की है। पालि-ग्रन्थों में देवदह के महाराज अंजन का विवरण प्राप्त होता है। जिनके दौहित्र गौतम बुद्ध थे। प्रो. दयानाथ त्रिपाठी की मान्यता है कि महाराज अंजन की गणभूमि ही कलांतर में विकृत होकर महाराजगंज एवं अंन्तत: महाराजगंज के रूप परिणित हुई। फारसी भाषा का गंज शब्द बाजार, अनाज की मंडी, भंडार अथवा खजाने के अर्थ में प्रयुक्त है जो महाराजा अंजन के खजाने अथवा प्रमुख विकय केन्द्र होने के कारण मुसिलम काल में गंज शब्द से जुड़ गया। जिसका अभिलेखीय प्रमाण भी उपलब्ध है। ज्ञातव्य हो कि शोडास के मथुरा पाषाण लेख में गंजवर नामक पदाधिकारी का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है। छठी शताब्दी ई0 में पूर्व में अन्य गणतंत्रों की भांति कोलिय गणतंत्र भी एक सुनिश्चित भोगौलिक इकाई के रूप में स्थित था। यहां का शासन कतिपय कुलीन नागरिकों के निर्णयानुसार संचालित होता था। तत्कालीन गणतंत्रों की शासन प्रणाली एवं प्रक्रिया से स्पष्टत: प्रमाणित होता है कि जनतंत्र बुद्ध अत्यन्त लोकप्रिय थे। इसका प्रमाण बौद्ध ग्रंथों में वर्णित शक्यो एवं कोलियों के बीच रोहिणी नदी के जल के बटवारें को लेकर उत्पन्न विवाद को सुलझाने में महात्मा बुद्ध की सक्रिय एवं प्रभावी भूमिका में दर्शनीय है। इस घटना से यह भी प्रमाणित हो जाता है कि इस क्षेत्र के निवासी अति प्राचीन काल से ही कृषि कर्म के प्रति जागरूक थे। कुशीनगर के बुद्ध के परिनिर्वाण के उपरांत उनके पवित्र अवशेष का एक भाग प्राप्त करने के उद्देश्य से जनपद के कोलियों का दूत भी कुशीनगर पहुंचा था। कोलियों ने भगवान बुद्ध क पवित्र अवशेषों के ऊपर रामग्राम में एक स्तूप निर्मित किया था, जिसका उल्लेख फाहियान एवं हवेनसांग ने अपने विवरणों में किया है। निरायवली-सूत्र नामक ग्रंथ से ज्ञात होता है कि जब कोशल नरेश अजातशत्रु ने वैशाली के लिचिछवियों पर आक्रमण किया था, उस समय लिचिछवि गणप्रमुख चेटक ने अजातशत्रु के विरूद्व युद्ध करने के लिए अट्ठारह गणराज्यों का आहवान किया था। इस संघ में कोलिय गणराज्य भी सम्मिलित था। छठी षताब्दी ई. पूर्व के उपरांत राजनीतिक एकीकरण की जो प्रक्रिया प्रारम्भ हुई उसकी चरम परिणति अशोक द्वारा कलिंग युद्ध के अनंतर शास्त्र का सदा के लिए तिलांजलि द्वारा हुआ। महराजगंज जनपद का यह संपूर्ण क्षेत्र नंदों एवं मौर्य सम्राटों के अधीन रहा। फाहियान एंव हवेनसांग ने सम्राट अशोक के रामग्राम आने एवं उसके द्वारा रामग्राम स्तूप की धातुओं को निकालने के प्रयास का उल्लेख किया है। अश्वघोष के द्वारा लिखित बुद्ध चरित (28/66) में वर्णित है कि समीप के कुण्ड में निवास करने वाले एवं स्तूप की रक्षा करने की नाग की प्रार्थना से द्रवित होकर उसने अपने संकल्प की परित्याग कर दिया था।
Source : महाराज गंज का इतिहास

नागवंशी कांशी नरेश राजा राम तथा शाक्य कुमारी अमृता का कोलवन में संयोग व कोलिय क्षत्रियों की उत्पत्ति

June 01, 2020 0
नागवंशी कांशी नरेश राजा राम तथा शाक्य कुमारी अमृता का कोलवन में संयोग व कोलिय क्षत्रियों की उत्पत्ति

ऐतिहासिक शोधों से प्रमाणित ।

शाक्यों की उत्पत्ति सूर्यवंशी महाराजा इक्ष्वाकु जिसे पाली भाषा ग्रन्थों में ओकाक कहा गया है तथा उनकी पट्टमहिषी रानी से हुई और शाकोट वन के कारण ये शाक्य क्षत्रिय कहलाये ।

साकेत (कौशल) के प्रतापी राजा इक्ष्वाकु की प्रथम रानी के चार पुत्र क्रमशः ओलखामुख, करकण्ड, हसितशोर्य व ओपुर तथा पाँच पुत्रियाँ अमृता (प्रिया), सुप्रिया, आनन्दा, विजीति व विजितसेना कुल 09 सन्ताने थी । राजा के लिये ये सभी सन्तानें प्रिय थी । नियमानुसार भी राजा इक्ष्वाकु के बड़ी रानी का बड़ा पुत्र ही राज्य सिहांसन का अधिकारी था ।

इक्ष्वाकु की एक और रानी जयन्ति के गर्भ से एक पुत्र जयन्त (जनु) का जन्म हुआ । इस रानी के मोहपाश में आकर राजा ने इन पुत्रों को निर्वासन की आज्ञा दे दी । इन पुत्रों के निर्वासन का मूल कारण छोटी रानी जयन्ती का स्वार्थमय विचार था, ताकि उसके पुत्र जयन्त (जनु) को राजगद्दी प्राप्त हो सके । इसलिये राजा इक्ष्वाकु को पूर्व सन्तानों को निर्वासन की आज्ञा देने के लिये विवश होना पड़ा । कई ग्रन्थों में इक्ष्वाकु वंशीय सन्तानें राजा सुजात की भी बताई गई हैं ।

इस प्रकार निर्वासित सन्ताने अपनी बहनों सहित पिता की आज्ञा का पालन करते हुए हिमालय की और अग्रसर हुई । रोहिणी नदी के तट पर एक विस्तृत शाक वन (साल का वन) में ये लोग रुक गए, क्योंकि इसी वन में महाऋषि भगवान कपिल का भी आश्रम था । ऋषि के आश्रम में पहुँचकर सभी राजकुमारों ने महाऋषि के दर्शन से बड़ी शान्ति मिली ।महाऋषि ने उनकी स्थिति का पूरा वृतान्त जानने के उपरान्त अपने ही आश्रम के पास सुन्दर स्थान का चयन कर निवास की आज्ञा दे दी । शाक वन (साल) के वृक्षों को काटकर निर्वासित राजपुत्रों ने एक सुन्दर बस्ती का निर्माण किया, जिसका नाम उन्होंने महाऋषि कपिल के नाम से कपिलवस्तु रख दिया । धीरे-धीरे भीषण वनों को काटकर इन राजकुमारों ने एक राज्य की स्थापना की, जिसका नाम शाक्य गणराज्य रखा गया और इक्ष्वाकु वंश की परम्परानुसार सबसे बड़े राजकुमार ओल्कामुख इस राज्य की राजगद्दी पर बैठे । अपनी इस शक्यता के कारण ये लोग शाक्य कहलाये और इनका वंश शाक्य वंश से प्रख्यात हुआ ।

  •  नागवंशी कांशी नरेश राजा राम तथा शाक्य कुमारी अमृता का कोलवन में संयोग व कोलिय क्षत्रियों की उत्पत्ति।
कांशी सोमदत्त के ब्रह्मदत्त नामक पुत्र हुए , इसी परम्परा में राम नाम के प्रतापी नर कांशी राजगद्दी पर आसीन हुए । सारी प्रजा इनके शासनकाल में वैभवशाली कांशी नगरी प्रसन्ता-पूर्वक जी रही थी । राजा अपनी प्रजा के लिये प्रजा के पालन तथा सुख-सुविधायों के लिये तत्पर थे । उनकी पचास सभासदों से उक्त कांशी नगरी हर दिशा में विश्व में प्रशंसनीय थी । प्रजा अपने प्रिय राजा के प्रति कृतज्ञ व स्नेहमय व्यवहार रखती थी । विधि का विधान राजा राम के लिये समय से पूर्व ही वन गमन की व्यवस्था लेकर उपस्थित हुआ कि प्रजापति राजा राम अचानक ही चरम रोग से ग्रसित हो गये । इस रोग से पीड़ित राजा राम ने भगवान के इस कार्यक्रम को स्वीकार करते हुए कांशी का राज्य अपने पुत्रों को सौंप स्वयं वन के लिये प्रस्थान कर दिया । सारी प्रजा इस अनहोनी घटना से हतप्रभ और दुःखी हुई। राजा राम तपस्या के लिये परमब्रह्म में साक्षात्कार से निमित्त हिमालय की पावन भूमि की ओर दण्ड-कमण्डल लेकर चल पड़े । अपनी विकट यात्रा पथ पर चलते हुए राजा राम ने हिमालय के वनखण्ड में विश्राम करना चाहा और अपनी तपस्या का सही स्थान जानकर वहीं निवास का निश्चय कर एक कोल वृक्ष के क्षेत्र में आसन जमा दिया । दिन-रात कठिन साधना और भोजन का एकमात्र साधन कोल वृक्ष के फल राजा के प्राण रक्षा हेतु थे । कालान्तर में राजा राम को अपने स्वास्थ्य में सुधार हुआ तथा राजा राम चर्मरोग से मुक्त हो गये । अब राजा राम दुगुने साहस से कठिन तप करने लग गये। कठिन तपस्या करने एवं कोल वृक्षों के वन्य फलों को भोजन के रूप में ग्रहण करना उनकी दिनचर्या थी । अब वह कांशी नरेश राजा राम नहीं अपितु कोल ऋषि के नाम से प्रख्यात हुए ।
  • कोलवन की प्रभावशाली जलवायु से रोगमुक्त।
जैसे कि पहले वर्णन किया जा चुका है कि इक्षवाकु वंशीय चारों राजकुमार निर्वासित होकर कपिलवस्तु में अपनी बहनों सहित निवास कर रहे थे । उनकी ज्येष्ठ बहिन अमृता-प्रिया नामों से कई स्थानों पर पुकारा गया है जो उनके जयेष्ठ होने के नाते संरक्षिका मातृतुल्य थी अचानक चर्मरोग से ग्रसित हो गई । बहिन को इस असाध्य रोग से ग्रसित देख सभी शाक्य राजकुमार चिंतित एवं दुःखी हुये । भरपूर उपचार के पश्चात भी अब अमृता रोग मुक्त नहीं हो पाई थी । विवश होकर शाक्य राजकुमारों ने खाने-पीने की सामग्री सहित हिमालय के पावन क्षेत्र में एक सुरिक्षत गुफा में उसके भाग्य पर छोड़ दिया तथा गुफा को उसके छोटे भाईयों द्वारा बड़ी-बड़ी शिलाओं से जंगली जानवरों के भय से बंद कर दिया था । शिला इतने बड़े थे कि वह उनको हिला तक न सकी । भाग्यवश कोलवन की प्रभावशाली जलवायु में धीरे-धीरे उसे स्वास्थ्य लाभ होने लगा तथा कुछ समय उपरान्त वह रोगमुक्त होकर पूर्ण स्वस्थ हो गई थी ।
  • राजा राम (कोल ऋषि) और  शाक्य राजकुमारी का पारस्परिक विवाह ।
एक दिन राजा राम (कोल ऋषि) को उस निर्जन वन में स्त्री कण्ठ ध्वनि सुनाई दी । कोल ऋषि ध्वनि को लक्ष्य दिशा निर्धारण कर आगे बढ़ने लगे । कुछ दूर आगे जाने पर देखते हैं कि एक व्याघ्र (भराग) एक गुफा में प्रवेश करने की चेष्टा कर रहा था और उसी गुफा से स्त्री कण्ठ ध्वनि आ रही थी । राजा राम के भय से व्याघ्र तो भाग गया और गुफा द्वार पर खड़े होकर उसी ध्वनि को सुनने लगे । उन्हें निश्चय हो गया कि यह ध्वनि उसी गुफा से आ रही है । बड़े परिश्रम से उन्होंने गुफा द्वार को साफ किया तो उन्हें एक स्त्री दिखाई दी । स्त्री बहुत रूपवान थी । राजा ने स्त्री का हाथ पकड़कर बाहर निकाला और राजा उसकी सुन्दरता देखकर चकित रह गया । राजा ने युवती का परिचय पूछा तो उसने बताया कि मैं शाक्य राजकुमारी हूँ तथा मुझे चर्मरोग हो गया था तो उसके भाइयों ने उसे इस गुफा में रख दिया था।  राजा ने युवती को अपने भाइयों के पास जाने की सलाह दी थी, किन्तु अमृता ने यह कहकर कि इक्षवाकु कुमारी एक ही बार किसी पुरुष का पाणिग्रहण कर सकती है । अब वह वहाँ नहीं जाएगी । अमृता ने राजा राम  का परिचय जानना चाहा तो राजा राम ने सारी कथा अमृता से कह डाली ।
           विधि का विधान मानकर दोनों कोलवृक्ष को साक्षी मानकर पारस्परिक विवाह सूत्र में बन्ध गये तथा इसी वन मे यह दंपत्ति निवास करने लगे ।
 
राजा राम (कोलऋषि) अपनी इस शाक्य पत्नी अमृता से जो सन्ताने हुई वे कोलिय कहलाये । अमृता व राम की संतानें धीरे-धीरे अपने माता-पिता के पालन में उसी कोलवन में यौवन की और अग्रसर होने लगी । विश्वकोश के विज्ञान लेखक के अनुसार राजऋषि कोल की संतति 24 पुत्रों की वंश परम्परा में 218 उपवंश उससे आगे 551 शाखाओं में सम्पूर्ण देश मे विस्तृत हुई ।

Friday, May 29, 2020

क्षत्रिय कोली पेरुम्बिदुगु मुथियार - तंजौर राज्य(तमिलनाडु)

May 29, 2020 0
क्षत्रिय कोली पेरुम्बिदुगु मुथियार - तंजौर राज्य(तमिलनाडु)

  • राज्य          : तंजौर राज्य (तंजावुर-तमिलनाडु)
  • शासक       : पेरुम्बिडुगु मुथैयार
  • शीर्षक       : महाराजा
  • जाति          : क्षत्रिय कोली
  • उप जाति    : मुथुराजा, मुदिराज, मुदिराज

पेरुम्बिडुगु मुथियार  द्वितीय का जन्म 23 मई, 675 ईस्वी में हुआ था। उनके पिता इलांगोविथारायण उर्फ मारन परमेस्वरन थे। वह 705 ई। में अपने पिता के बाद सिंहासन पर बैठा। पेरुम्बिदुगु मुथियार उर्फ ​​सुवरन मारन मुथारियार (705 ई.-745 ई।) तंजावुर के एक महान राजा थे। जो मुथुरायार क्षत्रिय कोली समुदाय के थे।  मुथुरायार भारत के क्षत्रिय कोली समुदाय के सबकास्ट हैं।

  • मुथुरायार पांड्यों  के समर्थन में लड़े।

मुथुरायार सरदारों ने पांड्यों और उनके समर्थकों के साथ पल्लवों की लड़ाई लड़ी। इतिहासकारों का मानना है कि तंजावुर पर विजयालय चोलन (846-880 ई।) ने राजा पेरुम्पिडुगु मुथियार से कब्जा कर लिया था। विजयालय चोल, जिन्होंने 9 वीं शताब्दी ईस्वी में पेरुम्बिडुगु मुथियार से तंजौर पर विजय प्राप्त की। यह माना जाता था कि मुथारियारों और चोलों ने वर्तमान तमिलनाडु के कुछ भूभागों पर अपना राजनीतिक वर्चस्व स्थापित करने के लिए आपस में लड़ाई की। उन्होंने पांड्यों के साथ लड़ाई की और दक्षिणी प्रायद्वीप पर आक्रमण किया और बाद में पल्लवों के समर्थन में पांडवों के साथ पांड्यों  के समर्थन में लड़े। मुथियारियों (मुदिराज) को समझा जाता था कि पल्लवों के सामंत बनने से पहले सदियों तक पल्लवों से लड़ते रहे।

चेरा, चोल और पांडिया राजवंश में सभी राजाओं में से तीन प्रमुख राजा हैं, जिनके शासन काल को स्वर्ण युग कहा जाता है। वो राजा हैं सुवरन मारन उर्फ पेरुम्बिदुगु मुथारियान, राजा राजा चोलन और सुंदरा पांडियन।

  • पिद्दुगु मुथारियान के पैतृक तमिल शिलालेख ।

  मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर सेंथलाई, जो तंजावुर जिले में स्थित है जहां अधिकांश शिलालेख गर्भ कक्ष के सामने एक हॉल के पत्थर के खंभों की सतह पर पाए जाते हैं। विद्वानों का मानना है कि नम्मम का मंदिर क्षतिग्रस्त हो गया होगा और सभी स्तंभों को नेम्मम से स्थानांतरित कर दिया गया था और बाद के समय में सेंथलाई में इस्तेमाल  किया गया था। सभी शिलालेखों को प्राचीन तमिल अक्षरों से खूबसूरती से उकेरा गया है, जो पत्थर के खंभों की चिकनी सतह पर बने हैं। इन शिलालेखों में सुवरन मारन उर्फ पेरुम पिद्दुगु मुथारियान के पैतृक नोट और उनकी पुण्यतिथि के बारे में चर्चा की गई है। मीकेरथी का अर्थ है उनके स्वभाव, कारनामों, साहस और अन्य आदि के आधार पर उन्हें प्रदान की जाने वाली उपाधियाँ ।

क्षत्रिय कोली राजपूत: महाभारत के युग के उपरान्त

महाभारत  युग के बाद क्रांतिकारी परिवर्तन। महाभारत के युग के उपरान्त इस सम्पूर्ण क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ। कोशल राज्य के अधीन अने...